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SC ST Act Bilaspur High Court Judgment: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के एक मामले में ऐतिहासिक स्पष्टीकरण दिया है। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकल पीठ ने निर्णय दिया है कि महज किसी व्यक्ति की जाति का उल्लेख करना इस अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट ने कहा कि सजा के लिए यह साबित होना अनिवार्य है कि जातिसूचक शब्दों का प्रयोग सार्वजनिक स्थान पर पीड़ित को जानबूझकर अपमानित या डराने-धमकाने के उद्देश्य से किया गया था। इसके साथ ही अदालत ने 16 साल पुराने केस में सत्र न्यायालय की सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
16 साल पुराने मामले में आरोपी बरी
बिलासपुर हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण फैसला 16 साल पुराने एक विवाद में सुनाया है। मामला 3 सितंबर 2008 का है, जब पथरिया स्थित छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल सब-स्टेशन में पदस्थ जूनियर इंजीनियर उत्तरा कुमार धृतलहरे ने एक शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, आरोपी मनोज पांडेय और कृष्णा साहू ने दुर्गा पूजा के लिए एक हजार रुपए चंदा मांगा था। चंदा देने से इनकार करने पर आरोपी ने कथित रूप से जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया।
इस मामले में सत्र न्यायालय ने 28 अगस्त 2010 को मनोज पांडेय को SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(10) के तहत दोषी ठहराया था, जबकि दूसरे आरोपी को बरी कर दिया गया था। मनोज पांडेय ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
स्वतंत्र गवाहों का नहीं मिला समर्थन
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि मामले के सभी स्वतंत्र गवाह मुकर गए (होस्टाइल हो गए) थे। ट्रायल कोर्ट ने केवल शिकायतकर्ता के बयान को आधार मानकर सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने पाया कि जब आरोपी को आईपीसी की अन्य धाराओं (451, 384, 294 और 506) के तहत पहले ही बरी किया जा चुका था, तो केवल शिकायतकर्ता के बयान के आधार पर SC/ST एक्ट की सजा देना उचित नहीं है। कोर्ट ने 2010 में दी गई सजा को कानूनन टिकाऊ नहीं माना और उसे रद्द कर दिया।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि आरोपी की मंशा पीड़ित को उसकी जाति के नाम पर अपमानित करने की थी। न्यायमूर्ति रजनी दुबे ने आदेश में लिखा कि जब तक जानबूझकर अपमान या भयभीत करने का इरादा सिद्ध न हो, केवल जाति का उल्लेख करना अपराध नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ किसी की जाति का नाम लेना SC/ST एक्ट के तहत जुर्म नहीं है। कोर्ट ने माना कि आईपीसी की धाराओं में बरी होने के बाद सिर्फ एक्ट के आधार पर सजा गलत है।
यह फैसला भविष्य में SC/ST एक्ट से जुड़े उन मामलों के लिए मिसाल बनेगा जहाँ व्यक्तिगत रंजिश के कारण जाति के नाम का उपयोग किया जाता है।
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