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Chaitra Navratri 2021 : जाने नवरात्र का वैज्ञानिक आधार

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Bansal news
Chaitra Navratri 2021 : जाने नवरात्र का वैज्ञानिक आधार

भोपाल। नवरात्र का धार्मिक पक्ष तो है ही इसी के साथ Chaitra Navratri: Know the scientific basis of Navratri आज हम इसका वैज्ञानिक पक्ष भी जानने की ​कोशिश करते हैं। इसके वैज्ञानिक पक्ष की बात करें तो दोनों प्रगट नवरात्रों के बीच में 6 माह का अंतर है। चैत्र नवरात्रि के बाद गर्मी का मौसम आ जाता है तथा शारदीय नवरात्रि के बाद ठंड का मौसम आता है। शरीर को गर्मी से ठंडी तथा ठंडी से गर्मी की तरफ जाने के लिए तैयार करने हेतु इन नवरात्रियों की प्रतिष्ठा की है।

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शरीर का होता है डिटॉक्सिफिकेशन
नवरात्रि में भक्त पूरे नियम कानून के साथ अल्पाहार एवं शाकाहार या पूर्णतया निराहार व्रत रखते हैं। इसके कारण शरीर का डिटॉक्सिफिकेशन होता है।अर्थात शरीर के जो भी विष तत्व है वे बाहर हो जाते हैं। इस दौरान पाचन तंत्र को आराम मिलता है। लगातार 9 दिन के आत्म अनुशासन की पद्धति के कारण मानसिक स्थिति बहुत मजबूत हो जाती है। जिससे डिप्रेशन, माइग्रेन, हृदय रोग आदि बिमारियों के होने की संभावना कम हो जाती है। वर्ष के बीच में रख्पे जाने वाले एक-एक दिन के व्रत से पाचन तंत्र तो मजबूत होता है परन्तु इससे मानसिक स्थिति सुदृढ़ नहीं हो पाती है।

महिसासुर का संहार यानि जड़ता का संहार
ज्योतिषाचार्य पंडित अनिल कुमार पाण्डेय के अनुसार भागवती ने सबसे पहले महिषासुर की सेना उसके बाद महिषासुर का वध किया। महिषासुर का अर्थ होता है ऐसा असुर जो कि भैंसें के गुण वाला है अर्थात जड़ बुद्धि है। महिषासुर का विनाश करने का अर्थ है समाज से जड़ता का संहार करना। समाज को इस योग्य बनाना कि वह नई बातें सोच सके तथा निरंतर आगे बढ़ सके।
समाज जब आगे बढ़ने लगा तो आवश्यक था कि उसकी दृष्टि पैनी होती तथा वह दूर तक देख सकता। अतः तब माता ने धूम्रलोचन का वध कर समाज को दिव्य दृष्टि दी। धूम्रलोचन का अर्थ होता है धुंधली दृष्टि। इस प्रकार मां ने धूम्र लोचन का वध कर समाज को दिव्य दृष्टि प्रदान की।
समाज में जब ज्ञान आ जाता है उसके उपरांत बहुत सारे तर्क—वितर्क होने लगते हैं। हर बात के लिए कुछ लोग उस के पक्ष में तर्क देते हैं और कुछ लोग उस के विपक्ष में तर्क देते हैं। समाज की प्रगति और अवरुद्ध जाती है। चंड—मुंड इसी तर्क और वितर्क का प्रतिनिधित्व करते हैं। माता ने चंड—मुंड की हत्या कर समाज को बेमतलब के तर्क—वितर्क से आजाद कराया।

मनोग्रंथियों के समान हैं रक्त—बीज

समाज में नकारात्मक ऊर्जा के रूप में मनो ग्रंथियां आ जाती हैं। रक्तबीज इन्हीं मनो ग्रंथियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस प्रकार एक रक्तबीज को मारने पर अनेकों रक्तबीज पैदा हो जाते हैं उसी प्रकार एक नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने पर हजारों तरह की नकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है। जिस प्रकार सावधानी से रक्तबीज को मां दुर्गा ने समाप्त किया उसी प्रकार नकारात्मक ऊर्जा को भी सावधानी के साथ ही समाप्त करना पड़ेगा।

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नवरात्रि में दिन से ज्यादा रात्रि का महत्व है
नव रात्र में दिन से ज्यादा रात का महत्व है। इसका भी एक विशेष कारण है। नवरात्रि में हम व्रत संयम, नियम, यज्ञ भजन पूजन योग साधना बीज मंत्रों का जाप कर सिद्धियों को प्राप्त करते हैं। अगर यही कार्य रात में करें तो हमारा जाप ज्यादा सफल होता है। जिस तरह रात के सन्नाटे में आवाज दिन की अपेक्षा ज्यादा घूमती है क्योंकि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की रेडियो तरंगों को रोकती है। दिन के वातावरण में कोलाहल रहता है जबकि रात में शांति रहती है। नवरात्रि में सिद्धि हेतु रात का ज्यादा महत्व दिया गया है।

शरीर के नौ द्वारों को शुद्ध करने का है पर्व

हमारे शरीर में 9 द्वार हैं। 2 आंख, 2 कान, 2 नाक, 1 मुख, 1 मलद्वार तथा 1 मूत्र द्वार। नौ द्वारों को सिद्ध व पवित्र करने के लिए इस पर्व का विशेष महत्व है। नवरात्रि में किए गए पूजन, अर्चन, तप, यज्ञ, हवन आदि से यह नवो द्वार शुद्ध होते हैं।

सफल होने के लिए चाहिए ताकत भी
नवरात्रि हमें यह भी संदेश देती है कि सफल होने के लिए सरलता के साथ ताकत की भी आवश्यक है। जैसे मां भगवती के पास कमल के साथ चक्र एवं त्रिशूल आदि हथियार भी हैं। समाज को जिस प्रकार कमलासन की आवश्यकता है उसी प्रकार सिंह अर्थात ताकत, वृषभ अर्थात गोवंश, गधा अर्थात बोझा ढोने वाली ताकत तथा पैदल अर्थात स्वयं की ताकत भी आवश्यक है।

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