चैत्र नवरात्र आज से : जाने घट स्थापना का शुभ मुहूर्त, क्या है महामारी नाशक मंत्र -

चैत्र नवरात्र आज से : जाने घट स्थापना का शुभ मुहूर्त, क्या है महामारी नाशक मंत्र

chaitra

भोपाल। आज से चैत्र नवरात्र शुरू हो रही हैं। jaane ghat sthaapana ka shubh muhoort, kya hai mahaamaaree naashak mantr पूरे नौ दिनों तक मां शक्ति की आराधना की जाएगी। इसी के साथ शक्ति की भक्ति का पर्व शुरू हो जाएगा। माता पूजन, श्रीदुर्गा सप्तशती पाठ के द्वारा माता को प्रसन्न किया जाएगा। कोई व्रत से तो कोई जप, तप व साधना से मां को प्रसन्न करेगा। मां धन, शक्ति और आरोग्यता प्रदान करती हैं। महामारी की इस दुर्गम परिस्थिति में मां की साधना ही सर्वोपरी है। मंदिरों और घरों में घट स्थापना की जाएगी। आइए जानते हैं कि क्या है घट स्थापना का शुभ ​मुहूर्त।

स्थिर लग्न में होगी घट स्थापना
ज्योतिषाचार्य पंडित रामगोविन्द शास्त्री के अनुसार घट स्थापना के लिए स्थिर लग्न का मुहूर्त शुभ है। जो सुबह से शुरू हो रहा है।

स्थिर लग्न — सुबह 7.21 – 9.17
चौघड़िया — लाभ — सुबह 10.30 – 12
अमृत — दोपहर 12 – 1.30

महामारी नाशक मंत्र

मां दुर्गा सप्तशती पाठ में ऋषियों ने कुछ मंत्र दिए हैं। इस मंत्र के संपुटित पाठ करने से महामारी नष्ट होती हैं।
जयंती मंगला काली, भद्रकाली कपालिनी।।
दुर्गा क्षमा शिवाधात्री, स्वाहा सुधा नमोस्तुते।।

मां के तीनों रूप हैं समाहित
पंडित सनत कुमार खम्परिया के अनुसार जिस प्रकार ऊँ में भगवान ब्रम्हृा, विष्णु और महेश समाहित हैं उसी प्रकार मां सिंहवासिनी की उपासना करने से महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती  तीनों की उपासना हो जाती है।

ऐसे करें कलश स्थापना
घर पर कलश स्थापना करने के लिए एक तांबे के बर्तन में जल भरें। उसमें चावल, सिक्का, हल्दी की पांच गांठ, पंचरत्न आदि डाल कर लोटे पर कलावा बांधे। इसमें आम के सात पत्ते डालें। उस पर चावल की कटोरी रखें। फिर उसके ऊपर कलावा बांध कर नारियल रखें। इस कलश को ईशान कोण में रखें।

नौ दिनों के 9 रूपों की पूजा

पंडित अनिल कुमार पाण्डेय के अनुसार वर्ष में चार बार नवरात्र आती है। दो बार गुप्त और दो बार प्रकट नवरात्र। प्रकट नवरात्र में मां के नौ रूपों की आराधना की जाती है। वे नौ रूप इस प्रकार हैं।

पहला रूप मां शैलपुत्री
नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां शैलपुत्री राजा हिमालय की पुत्री हैं। इन्हें सती भी कहा जाता है। पूर्व जन्म की भांति इस जन्म में भी इनकी शादी भगवान शिव से हुई है। मां शैलपुत्री वृषभ पर सवार हैं। इनके 2 हाथ हैं। एक हाथ में त्रिशूल है, दूसरे हाथ में कमल का फूल है। मां शैलपुत्री को मां पार्वती और हेमवती भी कहते हैं।

दूसरा रूप मां ब्रहृमचारिणी
नवरात्र पर्व के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं। इनके भी मां शैलपुत्री की भांति दो हाथ हैं। एक हाथ में जप की माला है व दूसरे हाथ में कमंडल है। कुंडलिनी शक्ति जागृत करने के लिए मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। मां दुर्गा का यह स्वरूप अनंत फल देने वाला है। इससे व्यक्ति के मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है।

तीसरा रूप मां चंद्रघंटा
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य शक्तियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियां सुनाई देती है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। मां के शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ में जेल में विभिन्न प्रकार के शस्त्र एवं वाण विभूषित हैं। मां का वाहन सिंह है तथा इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने की होती है।

चौथा रूप मां कूष्मांडा

नवरात्रि के चौथे दिन कूष्मांडा देवी की उपासना होती है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। यह आदिशक्ति हैं। इनके शरीर की कांति एवं प्रभा सूर्य के समान तेज है। मां की आठ भुजाएं हैं। इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहते हैं। इनके 7 हाथों में क्रमश कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है।

पांचवा रूप मां स्कंदमाता
मां का पांचवा रूप मां स्कंदमाता है। इनकी पूजा नवरात्रि के पांचवें दिन की जाती है। मां मोक्ष का द्वार खोलने वाली परम सुख दाई हैं। मां भगवान स्कंद अर्थात कुमार कार्तिकेय की मां हैं। कुमार कार्तिकेय देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। कुमार कार्तिकेय की मां होने के कारण इन्हें मां स्कंदमाता कहा जाता है। मां की चार भुजाएं हैं। उनके दाहिने तरफ की नीचे वाली भुजा जो ऊपर उठी हुई है उसमें कमल पुष्प है। बायीं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वर मुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर कि ओर उठी है, उसमें भी कमल पुष्प है। यह कमल के आसन पर विराजमान हैं तथा इनका भी वाहन सिंह है।

छठवां रूप मां कात्यायनी

नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक मां कात्यायनी का उल्लेख है। स्कंद पुराण में बताया गया है कि मां परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई है। मां कात्यायनी महर्षि कात्यायन की पुत्री थी। महिषासुर का संहार किया है। महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर अत्यंत बढ़ गया था तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ने अपने-अपने तेज कांच देकर महिषासुर के विनाश के लिए मां कात्यायनी को उत्पन्न किया था। मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला है। इनकी चार भुजाएं हैं। मां का दाहिनी तरफ का ऊपरी हाथ अभय मुद्रा में तथा नीचे वाला वर मुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरी हाथ में तलवार और नीचे के वाले हाथ में कमल पुष्प है। इनका वाहन सिंह है।

सांतवा रूप मां कालरात्रि

नवरात्रि के सातवें दिन दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि की पूजा की जाती है। इन्हें मां देवी काली, महाकाली ,भद्रकाली ,भैरवी आदि नाम से भी जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि देवी के इस रूप में सभी राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है। यह सभी नकारात्मक ऊर्जा मां के आने से पलायन कर जाती है। मां का शरीर घने अंधकार की तरह काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। इनके तीन नेत्र हैं। मां की नासिका से अग्नि की भयंकर ज्वाला निकलती है। इनका वाहन गर्दभ है। इनके ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं। दाहिने तरफ का निचला हाथ अभय मुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरी हाथ में लोहे का कांटा और नीचे वाले हाथ में कटार है।

आठवां रूप मां महागौरी
नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है इनकी उपासना से भक्तों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण भी श्वेत है। महागौरी की चार भुजाएं हैं। इनका वाहन वृषभ है। उनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे के बाएं हाथ में वर मुद्रा है। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है।

नवा रूप मां सिद्धिदात्री
नवरात्रि के नवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। ये मां सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं। इनकी उपासना से सभी सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। मां सिद्धिदात्री की चार भुजाएं हैं। उनके हाथों में गदा, चक्र, शंख एवं कमल है। मां का वाहन सिंह है तथा यह कमल के आसन पर आसीन हैं।

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