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Chhattisgarh Bilaspur High Court
Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के बिलासपुर हाईकोर्ट (Bilaspur High Court) ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 39 साल पुराने मामले में बिल सहायक (Bill Assistant) रामेश्वर प्रसाद अवधिया को राहत दी। अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। यह मामला 1980 के दशक में 100 रुपये रिश्वत (Bribery) लेने के आरोप से जुड़ा था।
निचली अदालत ने सुनाई थी सजा
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बिल सहायक रामेश्वर प्रसाद अवधिया को राहत[/caption]
रायपुर (Raipur) की निचली अदालत ने 9 दिसंबर 2004 को इस मामले में अवधिया को दोषी मानते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धाराओं के तहत एक साल की कैद और 1000 रुपये का जुर्माना लगाया था। उस फैसले को चुनौती देते हुए अवधिया ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
कैसे हुआ था मामला दर्ज?
शिकायतकर्ता अशोक कुमार वर्मा (Ashok Kumar Verma) ने वर्ष 1981 से 1985 के बीच सेवाकालीन बकाया बिल भुगतान के लिए वित्त विभाग (Finance Department) के बिल सहायक अवधिया से संपर्क किया था। आरोप था कि उन्होंने बिल पारित करने के लिए 100 रुपये की रिश्वत मांगी।
लोकायुक्त (Lokayukta) की टीम ने शिकायत पर कार्रवाई की और ट्रैप (Trap) की योजना बनाई। शिकायतकर्ता को 50-50 रुपये के रासायनिक लगे नोट देकर भेजा गया। इसके बाद टीम ने अवधिया को रंगे हाथों पकड़ने का दावा किया और मामला दर्ज कर न्यायालय में चालान पेश किया।
हाईकोर्ट ने कहा- साक्ष्य कमजोर
जस्टिस बिभू दत्त गुरु (Justice Bibhu Dutt Guru) की एकल पीठ ने अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1947 (Prevention of Corruption Act, 1947) के तहत दर्ज मामला अधिनियम 1988 लागू होने के बाद भी विचारणीय है। लेकिन अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि वास्तव में अवैध परितोषण (Illegal Gratification) की मांग और स्वीकृति हुई थी।
कोर्ट ने माना कि मौखिक, दस्तावेजी या परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Evidence) से रिश्वतखोरी का अपराध सिद्ध नहीं होता। इसलिए निचली अदालत का दोषसिद्धि आदेश अस्थिर है।
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आरोपी को मिली राहत
कोर्ट ने अभियोजन की कमजोरी का हवाला देते हुए दोषसिद्धि और सजा दोनों को रद्द कर दिया। इस फैसले के साथ ही रामेश्वर प्रसाद अवधिया को लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई से राहत मिली।
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