बुरहानपुर: इंदौर-इच्छापुर हाईवे बना ‘मौत की सड़क’, 4 साल में हजारों की मौत, हर साल बढ़ रहा मरने वालों का आंकड़ा

भोपाल: बुरहानपुर जिले की इंदौर इच्छापुर हाईवे मौत की सड़क बन चुकी हैं। मौत का ये रास्ता महज़ 30 किलोमीटर का है, लेकिन दुर्घटनाओं के आंकड़े इससे कहीं ज्यादा बड़े हैं। यहां 2020 के कोरोना काल में भी सड़क हादसों में कमी नही आई। कुल 219 दुर्घटनाएं हुईं, जिसमें 275 लोग घायल हुए। अक्टूबर तक हादसे में 71 लोग मारे गए। आइये पिछले कुछ सालों में हुए हादसों के आंकड़ों पर नज़र डालते हैं।

साल 2019 में 116 की मौत हुई
2017-18 में कुल 357 दुर्घटनाएं हुईं, जिसमें 439 घायल और 84 लोगों को यह खूनी सडक निगल गई। वहीं 2018 में दुर्घटनाओं का ग्राफ कुछ गिरा लेकिन घायलों की संख्या ज्यों का त्यों बनी रही। घायलों की संख्या 407 और मौतें 82 रही। वर्ष 2019 में दुर्घटनाओं में कोई खास कमी नहीं आई बल्कि घायलों की संख्या और मौतों का आंकड़ा बढ गया। 412 लोग घायल हुए तो वहीं 116 की मौत हुई, वहीं 2020 भी लोगों के लिए कयामत बनकर टूटा।

महामारी में भी दुर्घटनाएं कम नहीं हुईं
कोरोना काल में लाॅकडाउन होने के बावजूद भी विशेष फर्क नहीं पडा। इस दौरान 219 दुर्घटनाएं हुईं, घायलों की संख्या 275 और मृतकों का आंकड़ा अक्टूबर माह तक 71 रहा, वैसे मध्यप्रदेश में दूसरे राज्यों की तुलना में सडक हादसों में संख्या बल एक नंबर पर है।

इस संबंध में एसपी राहुल लोढा का कहना हैं, जिला प्रशासन के साथ मिलकर एक रोड मैप बनाएंगे जिसमें एमपीआरडीसी और जिला प्रषासन साथ मिलकर कार्य करेंगे। वहीं पूर्व विधायक रविंद्र महाजन का भी मानना है कि, अब सड़क पर गड्ढे या गड्ढों में सडक ढूंढना पड़ती है। कई बार टेंडर की बात कहते हैं लेकिन ना तो साईड पट्टी भरते हैं और ना ही सडकों को दुरूस्त करते हैं यहीं कारण हैं कि यह सड़क रोज किसी को ना किसी को निगल जाती हैं।

आरटीओ राकेष भूरिया का मानना है कि, कलेक्टर के निर्देशन में पुलिस, एमपीआरडीसी, पीडब्लूडी सभी का संयुक्त दल बनाकर सुधार कार्य के लिए कार्य करेंगे, वहीं प्रभारी कलेक्टर एवं जिला पंचायत सीईओ कैलाश वानखेड़े का भी कहना है कि जल्द ही सभी की संयुक्त बैठक बुलाकर सड़क हादसों को रोकने का कार्य करेंगे।

इस सड़क के रास्ते अपनी मंज़िल को निकलने वाले लोगों का सफर अक्सर मौत के मुंह में खत्म होता है। हादसे में अपनों को खोने वाले आंखों में आंसू लेकर उस दर्द के साथ जीने को मजबूर हो जाते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यही है की इतनी मौतों के बाद भी आज तक इस समस्या का निदान क्यों नही हुआ? और कब तक ये खूनी सड़क ऐसे ही इंसानी लहू से अपनी प्यास बुझाती रहेगी?

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