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Bilaspur High Court: बिलासपुर हाईकोर्ट से महामाया मंदिर ट्रस्ट उपाध्यक्ष को राहत, DFO को फटकार, जानें पूरा मामला

Bilaspur High Court: बिलासपुर हाईकोर्ट ने कछुए की मौत के मामले में महामाया मंदिर ट्रस्ट के उपाध्यक्ष सतीश शर्मा को अग्रिम जमानत दे दी है। कोर्ट ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का गलत इस्तेमाल करने पर डीएफओ को फटकार लगाई है।

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Shashank Kumar
Bilaspur High Court

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Bilaspur High Court: बिलासपुर से एक बड़ी और संवेदनशील खबर सामने आई है, जहां रतनपुर स्थित सिद्ध शक्तिपीठ महामाया मंदिर परिसर के कुंड में मृत पाए गए कछुओं के मामले में हाईकोर्ट ने मंदिर ट्रस्ट के उपाध्यक्ष सतीश शर्मा को अग्रिम जमानत दे दी है। वन विभाग द्वारा लगाए गए शिकार के आरोपों पर कोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए और विभाग के डीएफओ को जमकर फटकार लगाई।

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इस पूरे मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Bilaspur High Court) के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच में हुई, जहां याचिकाकर्ता सतीश शर्मा की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि उन पर वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9 के तहत जो शिकार का अपराध दर्ज किया गया है, वह पूरी तरह अनुचित और तथ्यों से परे है।

रात में ताला खोलने पर कोर्ट ने उठाए सवाल

अधिवक्ता ने बताया कि मंदिर परिसर में सफाई का निर्णय ट्रस्ट की सामूहिक बैठक में लिया गया था और सतीश शर्मा ने केवल सफाई के लिए तालाब का ताला खुलवाने की अनुमति दी थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि सफाई के दौरान ही कछुए मृत पाए गए, न कि किसी प्रकार का शिकार हुआ।

कोर्ट ने जब यह पूछा कि सफाई रात में क्यों करवाई गई, तो अधिवक्ता ने जवाब दिया कि नवरात्रि के दौरान दिन में भारी भीड़ होती है, इसलिए रात का समय चुना गया। हालांकि, इस पर चीफ जस्टिस ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, "रात में कौन सी सफाई होती है? इस तरह तो आप मंदिर की तिजोरी भी लुटवा देंगे।"

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"डीएफओ को नहीं है अधिनियम की समझ"

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने वन विभाग के डीएफओ की योग्यता और निर्णय पर भी सवाल उठाए। चीफ जस्टिस ने यहां तक पूछा कि "डीएफओ कितना पढ़ा लिखा है?" उन्होंने आगे कहा कि जिस व्यक्ति पर अपराध लगाया गया है, उस पर वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9 लागू ही नहीं होती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न तो शिकार हुआ है, न तस्करी, और न ही कोई प्रमाण ऐसा है जिससे सतीश शर्मा पर अपराध सिद्ध होता हो।

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वन विभाग की कार्यशैली पर सवाल

कोर्ट ने यह भी कहा कि डीएफओ को न तो अधिनियम की धारा 39 पता है और न ही 49, जबकि एफआईआर अज्ञात के नाम पर करवाई गई थी। यह दर्शाता है कि विभाग ने पूरी जानकारी के बिना ही एक गंभीर धाराओं में केस दर्ज कर दिया।

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इस निर्णय से जहां मंदिर ट्रस्ट को राहत मिली है, वहीं वन विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए हैं। कोर्ट के इस फैसले से यह साफ संकेत मिला है कि कानून का दुरुपयोग या गलत जानकारी के आधार पर की गई कार्यवाही, न्यायालय में नहीं टिक पाएगी।

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