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हाइलाइट्स
SC/ST Act का 69 साल पुराना है इतिहास
संशोधन को लेकर 2018 में हुआ था बवाल
एक्ट का दुरुपयोग रोकने कोर्ट दे चुका है कई निर्देश
SC-ST Act Update: देश में एससी एसटी एक्ट (SC-ST Act Issue) हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। एक पक्ष इसके दुरुपयोग और दूसरा पक्ष इसकी मजबूती के लिए आवाज उठाता रहा है।
अब इसे लेकर एक बार फिर बड़ा अपडेट सामने आया है। एक मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एससी एसटी एक्ट के मामले में अपराध तब ही माना जाएगा जब टिप्पणी सार्वजनिक की गई है।
सामान्य शब्दों में कहें तो कोर्ट ने ये एक डारेक्शन दी है कि एससी एसटी एक्ट में जातिसूचक या अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल में FIR तब ही होना चाहिए जब ये सार्वजनिक स्थानों पर की गई हो।
हाईकोर्ट ने रद्द की आपराधिक कार्रवाई
ताजा मामला यूपी से जुड़ा हुआ है। जहां नवंबर 2017 में कुछ लोगों पर एससी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज इस आधार पर किया गया कि उन्हें घर में घुसकर जाति-आधारित टिप्पणी की।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस विक्रम डी चौहान की पीठ ने एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध के संबंध में तीन व्यक्तियों (आवेदकों) के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दी।
हाईकोर्ट (High Court Direction) ने दोहराया कि जानबूझकर अपमान या धमकी देने का कथित कृत्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (एससी/एसटी अधिनियम) की धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध तभी माना जाएगा, जब यह सार्वजनिक रूप से किया गया हो।
क्यों बनाया गया था एक्ट
आजादी के बाद भी देश में जातिवाद हमेशा हावी रहा। यही कारण है कि हाशिए पर पड़े समुदायों के अधिकारों की रक्षा और उन्हें जाति आधारित भेदभाव, उत्पीड़न और हिंसा से बचाने के लिए इस कानून को बनाया गया।
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यह कानून अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों के अधिकारों का उल्लंघन करने वालों के लिए विभिन्न अपराधों और दंडों को भी निर्दिष्ट करता है।
80% एक्ट का गलत इस्तेमाल
SC ST Act को लेकर देश में सबसे बड़ा हिंसक आंदोलन 2018 में सामने आया था। उस समय ये बात निकलकर सामने आई थी।
उस समय सुप्रीम कोर्ट के मामलों के जानकार सत्यनारायण राव ने बताया था कि कोर्ट में 80% ऐसे मामले पहुंच रहे हैं जिनमें लोग इस एक्ट का गलत इस्तेमाल करते हैं।
https://twitter.com/BansalNewsMPCG/status/1793220210754830820
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश भर में 2013 में कुल 11060 एससी-एसटी ऐक्ट के तहत केस दर्ज हुए थे।
इनमें से जांच के दौरान 935 शिकायतें पूरी तरह से गलत पाई गई थी। समय के साथ ये आंकड़ा और बढ़ता गया।
2018 के सुप्रीम फैसले पर बवाल
एक्ट के समर्थन और विरोध में छोटे मोटे प्रदर्शन होते रहे, लेकिन इसे लेकर बवाल 2018 में मचा। 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए अहम फैसला (Supreme Court Order) सुनाया था।
इस फैसले के तहत सबसे बड़ा बदलाव था कि SC ST Act के तहत किसी भी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत के मामले में सीधी गिरफ्तारी नहीं होगी।
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इसके साथ ही अग्रिम जमानत की व्यवस्था करते हुए कुल 11 बदलाव किए थे। इसके बाद मानो पूरे देश में बवाल मच गया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के समर्थन और विरोध में लोग सड़कों पर उतर गए।
13 की मौत, सरकार बैकफुट पर
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक्ट में प्रस्तावित इन बदलावों से शेड्यूल्ड कास्ट (अनुसूचित जाति) संगठनों के लोग सड़कों पर उतरे और पहले की भांति ही बिना जांच के एफआईआर की मांग करते हुए इन सभी बदलावों का विरोध किया।
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देशभर में ट्रेनें रोकी गई। आगजनी से आंदोलन ने हिंसक आंदोलन का स्वरूप लिया। 13 लोगों की मौत हुई। 2 अप्रैल 2018 को 'भारत बंद' का स्वरूप देख सरकार बैकफुट पर आ गई। केंद्र सरकार ने SC/ST एक्ट को पुराने और मूल स्वरूप में लाने का फैसला किया।
सरकार ने कैबिनेट की मीटिंग में SC/ST एक्ट संशोधन विधेयक के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के फेरबदल का कोई मतलब नहीं रहा।
69 सालों में एक्ट का सफर
1. पहली बार यह कानून 1955 में आया। 1955 में संसद में अछूत (अपराध) एक्ट पास किया था। जिसे 30 जनवरी 1990 से जम्मू-कश्मीर छोड़ सारे भारत में लागू किया गया।
2. इस एक्ट में कुछ परिवर्तन को महसूस किया गया। जिसके साथ 1976 में अछूत (अपराध) एक्ट को प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (PRC) एक्ट कर दिया गया।
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3. इस एक्ट में एक बार फिर बदलाव की जरूरत महसूस हुई और इसे अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों की रोकथाम), 1989 एक्ट बना दिया गया।
4. साल 2015 में इस एक्ट में बड़ा बदलाव करते हुए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करना भी अपराध मानते हुए कार्रवाई/सजा का प्रवधान कर दिया गया।
5. इस एक्ट का इतिहास भले ही 69 साल पुराना हो, लेकिन इस एक्ट को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों की रोकथाम), 1989 एक्ट के नाम से ही जाना जाता है।
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कोर्ट द्वारा समय समय पर दिये गए निर्देश
A. SC ST Act के मामलों की जांच कम से कम डीएसपी रैंक के अधिकारी द्वारा की जाएगी।
B. किसी पर केस दर्ज होने पर उसे अग्रिम जमानत भी दी जा सकती है। अग्रिम जमानत देने या न देने का अधिकार मजिस्ट्रेट के पास ही होगा।
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C. यदि कोई भी सरकारी अधिकारी पर SC ST Act का केस दर्ज करवाता है तो केस दर्ज होने के बाद उस अधिकारी की गिरफ्तारी बिना उसके विभाग की इजाजत के नहीं होगी।
D. अगर किसी भी साधारण व्यक्ति पर SC ST Act का केस दर्ज होता है तो उसको अरेस्ट करने के लिए पुलिस को पहले एसपी से अनुमति लेनी होगी।
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कोर्ट के वो मामले जो चर्चा में रहे
मामला एक: जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने फैसला देते हुए कहा अनुसूचित जाति का सदस्य एससी/एसटी एक्ट को हथियार की तरह नहीं इस्तेमाल कर सकता है। कोर्ट ने नोट किया कि यह एक शुद्ध दीवानी विवाद था और ऐसे मामले में इस कठोर कानून को नहीं लगाया जा सकता है।
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मामला दो: मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस रविंद्र भट्ट और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि एससी एसटी एक्ट के तहत मामला तब दर्ज किया जाए जब ये साबित हो सके कि इस तरह की टिप्पणी जानबूझकर सार्वजनिक स्थान पर की गई है।
मामला तीन: नवंबर 2023 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने यह स्पष्ट किया था कि किसी व्यक्ति का अपमान या धमकी एससी एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं होगी, जब तक कि ऐसी टिप्पणी सार्वजनिक स्थान पर नहीं की जाती।
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