Bhopal: जानिए क्या है लालघाटी का इतिहास, क्यों बदलना चाहती है 'प्रज्ञा ठाकुर' इसका नाम?

Bhopal: जानिए क्या है लालघाटी का इतिहास, क्यों बदलना चाहती है 'प्रज्ञा ठाकुर' इसका नाम?Bhopal: Know what is the history of Lalghati, why Pragya Thakur wants to change its name? nkp

Bhopal: जानिए क्या है लालघाटी का इतिहास, क्यों बदलना चाहती है 'प्रज्ञा ठाकुर' इसका नाम?

भोपाल। बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर अपने बयानों को लेकर हमेशा सुर्खियों में बनी रहती हैं। अब एक बार फिर से वो सुर्खियों में हैं। इस बार उन्होंने भोपाल स्थित लालघाटी का नाम बदलने की मांग की है। उन्होंने कहा कि मैं इसके लिए सीएम शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखूंगी। लाल घाटी का इतिहास काफी विभत्स है, इसलिए इसका नाम बदला जाए। ऐसे में जानना जरूरी है कि लालघाटी का इतिहास क्या है?

लाल घाटी की कहानी

दरअसल, 'घाटी' किसी भी पहाड़ी गर्त या खाई को उंचाइयों से जोड़ने वाली राह को कहते हैं। लेकिन इस जगह का नाम 'लालघाटी' कैसे पड़ा इसके पीछे एक कहानी है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पाएंगे कि इंसानी खून से नहाने के बाद इस घाटी का नाम लालघाटी पड़ा था। बतादें कि भोपाल का पहला नवाब 'दोस्त मोहम्मद खां', बैरसिया के पास का एक जमींदार था। उसकी नजर भोजपाल नगरी पर थी। लेकिन भोजपाल पर कब्जा करने से पहले उसे रास्ते में जगदीशपुर के राजा 'नरसिंह राव चौहान' से जीत पाना मश्किल लग रहा था।

धोखे से मोहम्मद खां ने हमला करवा दिया

ऐसे में उसने नरसिंह राव चौहान को संधी के लिए एक मैत्री भोज पर आमंत्रित किया। दोनों इस पर सहमत हो गए। तय हुआ कि दोनों पक्षों से 16-16 लोग इस संधी में शामिल होंगे। दोस्त मोहम्मद खां ने थाल नदी के किनारे तंबू लगवाए और एक शानदार मैत्री भोज का आयोजन किया। जब राजा नरसिंह राव चौहान के सारे लोग मदहोश हो गए तो धोखे से दोस्त मोहम्मद खां ने उनलोगों पर हमला करवा दिया। उसके सैनिकों ने वीभत्स तरीके से नरसिंह राव चौहान के सारे लोगों की हत्या कर दी। नरसंहार इतना भीषण था कि नदी का पानी खून से लाल हो गया। उस दिन से इस नदी का नाम हलाली नदी हो गया। हलालपुर बस स्टैंड भी इसी नदी के नाम पर है।

इस प्रकार लाल घाटी का नाम पड़ा

नरसिंह राव चौहान की हत्या के बाद दोस्त मोहम्मद खां ने जगदीशपुर पर कब्जा कर लिया और इसका नाम इस्लामपुर कर दिया जिसे आज इस्लामनगर के नाम से भी जाना जाता है। जगदीशपुर पर कब्जा होने के बाद नरसिंह राव चौहान के बेटे ने अपना राज्य वापस पाने के लिए छोटी सेना संगठित की और पश्चिमी राह से चढाई कर दी, हालांकि वो 'दोस्त मोहम्मद खां' के अमले के सामने टिक नहीं पाया। उसकी सेना के खून से नहाकर घाटी लाल हो गई और तब से ही इस घाटी का नाम लालघाटी पड़ गया।

भोपाल के नवाब खानदान से संबंधित और बाद में पाकिस्तान के विदेश सचिव बने शहरयार मोहम्मद खां ने अपनी पुस्तक ‘द बेगम्स ऑफ भोपाल’ में भी इस कहानी की पुष्टि की है।

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