Bhopal Gas Tragedy: ताज-उल-मस्जिद से लेकर हमीदिया अस्पताल तक बिखरे पड़े थे लोग, कुछ ऐसा था भोपाल गैस त्रासदी का मंजर

Bhopal Gas Tragedy: ताज-उल-मस्जिद से लेकर हमीदिया अस्पताल तक बिखरे पड़े थे लोग, कुछ ऐसा था भोपाल गैस त्रासदी का मंजर Bhopal Gas Tragedy: People are scattered from Taj-ul-Masjid to Hamidia Hospital, something like this was the scene of Bhopal gas tragedy nkp

Bhopal Gas Tragedy: ताज-उल-मस्जिद से लेकर हमीदिया अस्पताल तक बिखरे पड़े थे लोग, कुछ ऐसा था भोपाल गैस त्रासदी का मंजर

भोपाल। आजाद भारत की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना "भोपाल गैस त्रासदी" (Bhopal gas tragedy) को आज 37 साल होने जा रहे हैं। लेकिन आज भी इसकी टीस लोगों के जेहन में पूरी तरह ताजा है। बता दें कि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में यूनियन कार्बाइनड के कीटनाशक संयंत्र से निकली कम से कम 30 टन मिथाइल आइसोसायनेट गैस से करीब 6 लाख लोग प्रभावित हुए थे। वहीं सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब 4 हजार मौतें हुई थी।

आज भी कई लोग सांस की बीमारियों से जुझ रहे हैं

आइसोसायनेट गैस के जहरीले कण आज भी हवा में मौजूद हैं। इस कारण से हजारों पीड़ित और उनकी अगली पीढियां श्वसन संबंधित बीमारियों से जूझ रही है। आज भी कई बच्चे ऐसे पैदा होते हैं। जिनके आंतरिक अंग और प्रतिरक्षा प्रणाली बहुत कमजोर होती है। इस भयावह घटना को काफी करीब से देखने वाले डॉक्टर, डीके सत्पथी बताते हैं कि 2 दिसंबर 1984 की रात करीब 12 या 1 बजे उनके प्रोफेसर उनके घर पहुंचे और उन्हें जल्द से जल्द हमीदिया अस्पताल पहुंचने को कहा।

ताज-उल-मस्जिद से लेकर हमीदिया तक लोग बिखरे पड़े थे

डॉ. सत्पथी को पता था कि कुछ घटना हुई है, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि इतनी बड़ी घटना घटी है। ऐसे में उनके प्रोफेसर ने उनसे कहा कि यहां जो हताहत हुआ है वह हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा है। सत्पथी भी बिना कुछ सोचे समझे अपने निवास स्थान ईदगाह हिल्स से सीधे हमीदिया अस्पताल की तरफ बढ़े। वे जैसे ही रवाना हुए उन्होंने देखा की ताज-उल-मस्जिद से लेकर मेडिकल कॉलेज (हमीदिया अस्पताल) तक लोग बिखरे पड़े हैं। इसमें से कुछ लोग उल्टी कर रहे थे, तो कई लोग मर चुके थे।

अस्पताल में सैंकड़ो की संख्या में लाशें पड़ी हुई थीं

यह देखकर सत्पथी हैरान रह गए। जैसे ही वे हमीदिया अस्पताल पहुंचे। वहां सैंकड़ो की संख्या में लाशें रखी हुई थीं। उन्होंने अपने सहयोगी से पूछा की क्या है पूरा मामला तो उन्होंने बताया कि करीब रात के 11 बजे 3 से 4 आदमी उल्टी और मुंह में जलन की शिकायत लेकर अस्पताल आए थे। तब तक डॉक्टरों को ये भी नहीं पता था कि कौन सी गैस लिक हुई है। धीरे-धीरे करके लोग लगातार अस्पताल में बढ़ते गए।

तीन दिन के अंदर 3 हजार लाशों का हुआ था पोस्टमार्टम

इससे अस्पताल की पूरी व्यवस्था चरमरा गई और लोग अस्पताल कैंपस में ही दम तोड़ने लगे। वहां इतने लोग मर चुके थे कि उनके नाम से लाशों को नहीं रखा जा सकता था। ऐसे में अस्पताल प्रशासन ने सभी लाशों को नंबर से रखना शुरू किया। डॉ सत्पथी बताते हैं वहां वे और उनकी टीम ने मिलकर 3 दिन के अंदर करीब 3 हजार लाशों का पोस्टमार्टम किया था। भोपाल जैसे खूबसूरत शहर में उस रात जो हुआ उसे याद कर आज भी लोग सिहर उठते हैं।

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