इलाहाबाद हाईकोर्ट: हज के लिए अंतरिम जमानत से इनकार, कहा- 'हज यात्रा पूर्ण अधिकार नहीं, सजा काटने के बाद भी जा सकते हैं'

Allahabad High Court Hajj Yatra 2025 Case Update; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी को हज यात्रा के लिए अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक कर्तव्य कानून से ऊपर नहीं हो सकता

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हाइलाइट्स

  • हत्या के दोषी को हज यात्रा के लिए अंतरिम जमानत नहीं मिली
  • हाईकोर्ट ने कहा- धार्मिक कर्तव्य कानून से ऊपर नहीं
  • सिर्फ एक माह जेल काटने वाले को नहीं मिली हज की अनुमति

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को हज यात्रा पर जाने के लिए दी गई अंतरिम जमानत की याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति अलोक माथुर की एकल पीठ ने कहा कि हज यात्रा एक धार्मिक कर्तव्य जरूर है, लेकिन यह अधिकार निरंकुश नहीं है और दोषी व्यक्ति को कानून के दायरे में रहते हुए ही इसे पूरा करना होगा।

क्या है मामला?

जहिर नामक व्यक्ति को बहरीन की एक अदालत ने धारा 304/34 IPC के तहत 10 साल की सजा और धारा 323 के तहत 6 महीने की सजा सुनाई थी। सजा पाने से पहले उसने अपनी पत्नी के साथ हज यात्रा के लिए आवेदन किया था और शुल्क भी जमा किया था। उसका चयन 4 मई 2025 से 16 जून 2025 तक की प्रस्तावित हज यात्रा के लिए हो गया था।

सजा के बाद जहिर ने हज यात्रा के लिए हाईकोर्ट में अल्पकालिक जमानत की याचिका दायर की। उसके वकील ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हज इस्लाम धर्म का महत्वपूर्ण धार्मिक कार्य है और पहले भी एक मामले में दोषी व्यक्ति को यात्रा की अनुमति दी जा चुकी है।

कोर्ट का रुख

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हज एक धार्मिक कर्तव्य है, लेकिन इससे जमानत का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता, खासकर तब जब दोषी को हाल ही में सजा हुई हो। कोर्ट ने कहा कि जहिर को सिर्फ एक महीने पहले (26 मार्च 2025) जेल भेजा गया है, जबकि उसे 10 साल की सजा दी गई है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि अल्पकालिक जमानत या पैरोल केवल गंभीर चिकित्सा स्थितियों या आपात पारिवारिक कारणों में ही दी जाती है। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से भिन्न परिस्थितियों को रेखांकित करते हुए कहा कि उस मामले में दोषी ने 10 साल की सजा पूरी कर ली थी, जबकि जहिर ने अभी सजा की शुरुआत ही की है।

कोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति अलोक माथुर ने कहा: "निस्संदेह हज इस्लाम धर्म का एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है, लेकिन केवल इस आधार पर कि आवेदन सजा से पहले किया गया था, उसे जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।"

कोर्ट ने आगे कहा कि: "धारा 21 के तहत प्रदत्त स्वतंत्रता कानून के अनुसार ही दी जाती है और सजा के बाद की गई कैद व्यक्ति की स्वतंत्रता को वैधानिक रूप से सीमित करती है।"

कोर्ट ने ये भी कहा कि जहिर अपनी सजा पूरी करने के बाद हज यात्रा की स्वतंत्रता का उपयोग कर सकता है। फिलहाल, उसकी जमानत याचिका को अस्वीकार कर दिया गया है।

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