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भारतीय लोकतंत्र का वो दिन, जब संविधान के शब्द मौन हो गए और सत्ता की कलम ने आज़ादी पर सेंसर की स्याही फेर दी... विचारों पर पहरा था, कलम कैद थी और जनता की आवाज़ दबा दी गई थी... ये सिर्फ एक तारीख नहीं, इतिहास का वो काला अध्याय है जिसने लोकतंत्र की नींव तक हिला दी थी...आज हम उस अध्याय को फिर से पढ़ेंगे, ताकि भूल न हो फिर से वही गलती...
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