‘किसानों की आय, रोजगार सृजन में लाभकारी है ठेका खेती, पर किसानों की मोल-तोल शक्ति बढ़ाने की जरूरत’

नयी दिल्ली, तीन जनवरी (भाषा) कृषि कानूनों को लेकर किसानों के विरोध के बीच एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ठेका खेती किसानों को नई प्रौद्योगिकी तक आसान पहुंच सुनिश्चित करने के साथ ही उनकी आय बढ़ाने और रोजगार सृजन में लाभकारी है। हालांकि, इसमें इस बात को लेकर सावधान किया गया है कि कंपनियों के समक्ष किसानों की मोल- तोल की ताकत बढ़ाने की जरूरत है।

‘ठेका और काश्तकारी खेती: पांच राज्यों से सबक’ विषय पर जारी रिपोर्ट में यह बात कही गयी है। इसमें कृषि कारोबार से जुड़ी कंपनियों के समक्ष किसानों के व्यक्तिगत रूप से मोल-तोल की शक्ति बढ़ाने की जरूरत को रेखांकित किया गया। इसके साथ ही कंपनियों के साथ बेहतर और समान स्तर पर अनुबंध के लिये कदम उठाने का सुझाव भी दिया गया है।

पांच राज्यों … पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश अैर तेलंगाना के 2014 किसानों और 384 श्रमिकों के बीच किये गये सर्वेक्षण पर आधारित इस रिपोर्ट के अनुसार ठेका खेती किसानों की आय बढ़ाने के साथ रोजगार सृजन में भी फायदेमंद है।

इस रिपोर्ट को बेंगलुरू स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज के प्रोफेसर प्रमोद कुमार ने तैयार किया है। प्रमोद कुमार ने ‘भाषा’ से फोन पर कहा, ‘‘इन पांच राज्यों का चयन इसलिये किया गया है कि इन राज्यों में पहले से ही बड़े पैमाने पर ठेका खेती हो रही है।’’

कुल 2014 किसानों के बीच किये गये सर्वे में 1408 यानी करीब 70 प्रतिशत कृषि ठेका खेती में शामिल थे। इसमें किसानों ने बताया कि कंपनियां जो भी अनुबंध करती हैं, उसकी शत प्रतिशत खरीद की जाती है। ‘‘कुछ ही किसानों ने यह संकेत दिया कि पांचों राज्यों में उपज के छोटे हिस्से को ही कंपनियों ने खारिज किया।’’

इसके अनुसार, ‘‘ठेका खेती के अंतर्गत फसल उत्पादन का प्रति एकड़ औसत मूल्य 52 हजार रुपये रहा जो सर्वाधिक है। जबकि पट्टे पर और नियंत्रित परिवेश में की गयी खेती के मामले में यह क्रमश: 43 हजार रुपये और 38 हजार रुपये था।’’

सर्वे में शामिल राज्यों में अनुबंध खेती के तहत प्रति फसल एकड़ उत्पादन मूल्य आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सर्वाधिक 91 हजार रुपये जबकि कर्नाटक में 68 हजार, पंजाब में 51.5 हजार और हरियाणा में सबसे कम 41 हजार रुपये था।

कुमार के अनुसार दक्षिणी राज्यों में ठेका खेती के अंतर्गत फसल का अधिक मूल्य मिलने का कारण उच्च मूल्य वाले जिंसों जैसे शिमला मिर्च, खीरा, हरी मिर्च और बेबी कार्न का उत्पादन होना है। दूसरी तरफ हरियाणा में गेहूं और चावल तथा पंजाब में गेहूं और आलू की खेती होती है।

उन्होंने कहा, ‘‘आलू को छोड़कर पंजाब और हरियाणा में जिन फसलों का उत्पादन किया जा रहा है, उनका मूल्य दूसरी फसलों के मुकाबले कम बैठता है। वहीं दक्षिणी राज्यों में ऊंचे दाम वाली फसलों की खेती ज्यादा हो रही है।’’

कुमार के अनुसार, ‘‘फसलों में बदलाव लाकर तथा फल, सब्जी जैसी अधिक दाम की खेती को अपनाने से निर्धारित अवधि में किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिल सकती है।’’

एक सवाल के जवाब में कुमार ने कहा, ‘‘निश्चित आय के अलावा बेहतर गुणवत्ता वाली उपज के लिये अच्छा मूल्य, बाजार की गारंटी जैसे कारणों से किसान ठेका खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।’’

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘उच्च मूल्य वाले जिसों को लेकर फसल प्रतिरूप में नवप्रवर्तन लाने को लेकर अनुबंध खेती को तरजीह दी जानी चाहिए। क्योंकि किसान तकनीकी जानकारी, बीजों और प्रौद्योगिकी का अभाव तथा निश्चित उत्पाद बाजार के अभाव में इन फसलों की खेती नहीं कर पाते और लाभ से वंचित रह जाते हैं।’’

ठेका खेती को लेकर किसानों की चिंता के बीच इस रिपोर्ट में कंपनियों एवं किसानों के बीच मोल-तोल की संतुलित शक्ति और बेहतर तालमेल की जरूरत बतायी गयी है। इसके लिये किसानों को कृषक उपज संगठनों (एफपीओ), सहकारी संस्थानों और स्वयं-सहायता समूह के जरिये एकजुट करने का सुझाव दिया गया है।

इसमें अनुबंध के स्तर पर किसान और कृषि कारोबार से जुड़ी कंपनियों के बीच बेहतर और समान स्तर पर अनुबंध के लिये संस्थागत हस्तक्षेप की जरूरत को रेखांकित किया गया है।

खेतिहर मजदूरों के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि ठेका खेती में परंपरागत और खेती-बाड़ी के अन्य तौर-तरीकों के मुकाबले अधिक मानव दिवस श्रम सृजित हुए।

सर्वे के अनुसार, ‘‘ठेका खेती के तहत काम करने वाले मजदूरों की कमाई सालाना 75 हजार रुपये रही जबकि गैर-ठेका खेती के मामले में यह 50 हजार रुपये सालाना थी।’’

भाषा

रमण महाबीर

महाबीर

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