'राजनीति'

नगरीय निकाय चुनाव में दांव पर लगा दो नेताओं का राजनीतिक भविष्य, अरूण यादव को संजीवनी की तलाश, तो नंदकुमार के सामने जीत बरकरार रखने की चुनौती।

11/28/2014 12:00:00 AM

आज हो रहे मतदान के बाद प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला तो ईवीएम में कैद होगा। साथ ही दो पार्टियों के प्रमुखों का राजनीतिक भविष्य भी तय हो जाएगा। क्योंकि संकेत तो कुछ ऐसे हैं, कि इन चुनावों में हार मिली तो कुर्सियां खतरे में है। चाहे बात पीसीसी अध्यक्ष अरुण यादव की करें, या फिर बीजेपी अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान की। मामला गंभीर इसलिए है। क्योंकि सूत्र बताते हैं कि दोनों को ही संकेत दिल्ली दरबार ने दिए हैं।

दांव पर पार्टियों की प्रतिष्ठा।

9 नगर निगम, 26 नगर पालिकाएं और 100 नगर परिषद। 28 नवंबर को चुनाव। उससे पहले धुआंधार प्रचार, लेकिन 26 को जैसे ही प्रचार खत्म हुआ। समीक्षा बैठकें हुई। दोनो पार्टियों की तरफ से जीत की संभावनाएं टटोली गई। इतनी गंभीरता विधानसभा और लोकसभा चुनाव में नहीं देखी गई, तो फिर इस चुनाव में इसकी क्या वजह? राजनीतिक दल ये दलील दे सकते हैं कि, चुनाव तो चुनाव है, उसमें छोटे बड़े का फर्क नहीं किया जा सकता। मगर सवाल उठना तो लाजमी है। जवाब खोजे जाए तो ये भी मिलता है कि दोनो पार्टियों की प्रतिष्ठा दांव पर हैं। बीजेपी मुखिया नंदकुमार सिंह चौहान का राजनीतिक ग्राफ तो इन्हीं चुनाव पर टिका है। दिल्ली के संकेत यही है कि, नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे तो हाथ से कमान खिसक सकती है। दिल्ली ने संदेश प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबबुद्धे के जरिए पहुंचाया। साथ ही काम करने के लिए फ्री हैंड भी दिया। सूत्र बताते है कि, नंदकुमार सिंह चौहान का राजनीतिक करियर डगमगाए नहीं, इसलिए मुख्यमंत्री शिवराज ने मोर्चा संभाला और सीएम ने नंदकुमार को सिर्फ देवास और खंडवा पर फोकस करने के लिए कहा। मदद चारों तरफ से मिले, इसलिए सीएम ने विधायकों और मंत्रियों तक को जिम्मेदारी सौंप दी। उन्हें कह दिया कि, इसी के आधार पर बनेगी परफार्मेंस रिपोर्ट। ऐसे ही निर्देश जिला और संभागीय समितियों को भी दिए हैं।

नंदकुमार और अरुण यादव के राजनीतिक करियर का सवाल।

ये तो हुई बीजेपी की बात कमोवेश कांग्रेस में भी हालात कुछ ऐसे ही है। चुनाव में कामयाबी नहीं मिली तो पीसीसी अध्यक्ष अरुण यादव का सूरते हाल भी ठीक नहीं होगा। सूत्र बताते है कि, दिल्ली से राहुल गांधी ने संकेतों के जरिए नहीं, बल्कि दो टूक शब्दों में बता दिया है। टिकट के वक्त दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया का फोन न उठाना भी यादव को महंगा साबित हो सकता है। अरुण यादव ने आर-पार की इस लड़ाई में अपने विधायकों, जिला अध्यक्षों को परिणाम भुगतने का संदेशा पहुंचा दिया है।


चुनावी पिच पर परफार्मेंस अहम।

चुनावी पिच पर परफार्मेंस दोनों ही पार्टियों के कप्तानों के लिए बेहद अहम है। प्रचार में ताकत झोंकने की वजह भी यही रही है। दूसरे चरण के लिए भी नजारा कुछ ऐसा ही है। आखिर राजनीतिक भविष्य का सवाल जो है।
 


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