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सफेद गोंद का काला बाजार, चंद पैसों के लिए पर्यावरण से खिलवाड़ !

21 Apr 2018

बागलीः मिलावट का दौर है। हर चीज में मिलावट का बोलबाला है। कुछ चीजे इससे अछूती थी मगर अब यहां भी सेंध लग चुकी है और वो है पेड़ों से निकलने वाला गोंद। मगर आपको जानकर ये हैरानी होगी कि ज्यादा मात्रा में गोंद हासिल करने के लिए अब पेड़ों का भी कैमिकल ट्रीटमेंट किया जा रहा है। देवास जिले के बागली में ये काम धड़ल्ले से हो रहा है।


बागली का पुंजपुरा और उदनगर फॉरेस्ट रेंज में बड़ी संख्या में सागौन के साथ पाया जाता है धावड़िया साल का पेड़ जिससे निकलता है गोंद। गोंद वैसे तो प्राकृतिक रूप से पेड़ो से निकलता है मगर बाजारवाद के इस जमाने में अब इस सफेद गोंद का कालाबाजर तेजी से पनप रहा है।


ये सच्चाई है और बंसल न्यूज ने इस बियाबान जंगल में जाकर इस सच्चाई का पता लगाया। एक कैमिकल की मदद से पेड़ों से महज 24 घंटे में गोंद पेड़ों की छालों पर उभरने लगता है और एक हफ्ते में अच्छा खासा गोंद इन बोतलों में इकट्ठा हो जाता है, जबकि प्राकृतिक रूप से गोंद निकलने में एक हफ्ते से ज्यादा का समय लगता था।  खास बात ये कि गोंद का कारोबार करने वाले व्यापारी ही ग्रामीणों को ये कैमिकल मुहैया करवाते है।


आखिरकार कृत्रिम रूप से गोंद निकालने की जरूरत क्यों पड़ी है, वजह है गोंद की डिमांड और सप्लाई में अंतर। कृत्रिम रूप से निकलने वाला गोंद। बाजार में करीब 600 रुपए किलो बिकता है मगर ग्रामीणों से ये औने पौने दामों पर खरीदा जाता है। ग्रामीणों को नहीं पता कि वो क्या कर रहे है। मगर कमाई अच्छी होती है, क्योंकि एक दिन में 4 से पांच क्विंटल गोंद जंगल से बाहर जाता है।


ऐसा नहीं है कि वन विभाग को सफेद गोंद के इस काले खेल के बारे में जानकारी ना हो। पिछले दिनों विभाग की तरफ से ग्रामीणों के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया गया था जिसमें उन्हें प्राकृतिक रूप से ही गोंद निकालने की सलाह दी गई थी।


यानी वन विभाग को पता है कि कुछ गड़बड़ हो रही है मगर ये भी तय बात है कि यदि खुलेआम इस तरह से गोंद निकालने का काम हो रहा है तो कहीं ना कहीं विभाग के निचले स्तर के स्टॉफ की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता। गोंद निकालने के इस तरीके से सबसे ज्यादा नुकसान पेड़ों का हो रहा है जो दो से तीन साल में ही सूख रहे है। मिलावट का ये गंदा धंधा पेड़ों की जान ले रहा है। चंद पैसों के लिए व्यापारी पर्यावरण से खिलवाड़ कर रहे है और ग्रामीण इन व्यापारियों के मोहरे बने हुए है।


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