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मातृभाषा, राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय स्वाभिमान

2/20/2018 12:00:00 AM

मातृभाषा मात्र संवाद ही नहीं अपितु संस्कृति और संस्कारों की संवाहिका है। भाषा और 

संस्कृति केवल भावनात्मक विषय नहीं, अपितु देश की शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी विकास से जुडा़ है। मातृभाषा के द्वारा ही मनुष्य ज्ञान को आत्मसात करता है, नवीन सृष्टि का सृजन करता है तथा मेधा, पौरूष और ऋतम्भरा प्रज्ञा का विकास करता है। किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा और उसकी संस्कृति से होती है। विचारों एवं भावनाओं की अभिव्यक्ति तो मूलतः मातृभाषा में ही होती है। मातृभाषा सुसम्बद्व और सुव्यवस्थित योजना की पूर्ति का महत्वपूर्ण घटक है। भाषा यादृच्छिक संकेत है। मानवीय सभ्यता की धरोहरों की तरह एक धरोहर है।

 

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट का मानना है कि, अधिकांश बच्चे स्कूल जाने से इसलिए कतराते हैं कि शिक्षा का माध्यम वह नहीं है जो भाषा घर में बोली जाती है। बाल अधिकार घोषणा पत्र में कहा गया है कि बच्चे को उसी भाषा में शिक्षा दी जाए जिस भाषा में उसके माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन व परिवार के सदस्य बातें करते हैं। भाषा भावनाओं और संवेदनाओं को मूर्तरूप दिए जाने का माध्यम है न कि प्रतिष्ठा का प्रतीक। विश्व के अन्य देशों में मातृभाषा की क्या स्थिति है इसका वैचारिक और व्यावहारिक विश्लेषण करते हैं, तब ज्ञात होता है कि विविध राष्ट्रों की समृद्धि और स्वाभिमान की जड़ें मातृभाषा से सिंचित हो रही हैं। राष्ट्र की क्षमता और राष्ट्र के वैभव के निर्माण में मातृभाषा का महत्वपूर्ण योगदान है। आयातीत भाषाएं न तो राष्ट्र के वैभव की समृद्धि करती हैं और न ही राष्ट्रत्व-भाव को जागृत करती हैं। संस्कार, साहित्य- संस्कृति, सोच, समन्वय, शिक्षा, सभ्यता का निर्माण, विकास और उसका वैशिष्ट मातृभाषा में ही संभव है।

मातृभाषा के प्रति समर्पण और अनुराग-भाव की दृष्टि से विचार करें तो यह स्पष्ट होता है कि आज विश्व के अधिकांश देशों का इतिहास और प्रमाण यह दर्शाता है कि ये देश अलग-अलग कालखण्डों में औपनिवेशिक शक्तियों के गुलाम रहे हैं परन्तु गुलामी के पश्चात् स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्होंने अपनी-अपनी मातृभाषाओं को स्थापित किया। श्रीलंका, ब्राजील, मैक्सिको, चिली, कोलम्बिया, क्यूबा, जापान, चीन, इण्डोनेशिया, म्यांमार, मलेशिया आदि ने मातृभाषा अपनाकर ही विकास के मार्ग प्रशस्त किए हैं। सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी, वैज्ञानिक एवं अन्य समसामयिक ज्ञान का विस्तार मातृभाषा में ही किया। चीन और जापान तो ऐसे अनुकरणीय उदाहरण हैं जिन्होंने मातृभाषा के माध्यम से विकास के क्षेत्र में वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित हुए हैं। 


प्रस्तुत आलेख में मातृभाषा की स्थापना, उसके संरक्षण और समृद्धि के लिए विश्व में क्या हुआ, के विभिन्न देशों एवं भारत की नीति एवं कार्य-योजना की समीक्षात्मक विवेचना की गई है। 


इस यथार्थ को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि 1949 तक भूखमरी की प्रताड़ना भोग रहा चीन आज विश्व की प्रमाणिक अर्थ व्यवस्था के रूप में स्थापित हुआ है, तो इसका मुख्य विकास का मंत्र, चीन की मातृभाषा में ज्ञान विज्ञान के अध्ययन और शोध कार्यों को जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति तक चीन के विकास का लोहा मान रहे हैं। चीन की इस उन्नति और विकास के संबंध में मैंने चीन प्रवास के दौरान जब विभिन्न चीनी विद्वानों और विशेषकर चीनी प्राच्य भाषा के शीर्षस्थ विद्वान प्रो. ची. श्येलिन एवं चीनी समाज विज्ञान अकादमी के प्रो. वांड.शूइंग से साक्षात्कार के दौरान जानना चाहा कि, क्या कारण है कि इतने कम समय में चीन उत्कृष्ट विकास की दिशा में उन्नत हो रहा है तो उनका कहना था कि इसका श्रेय हमारी मातृभाषा को शोध एव अध्ययन को जाता है।

आज भारत में मातृभाषा की उपेक्षा कर शिक्षा के माध्यम से उसे पृथक रखकर जिस प्रकार के भाषा संस्कार डाले जा रहे हैं वह घातक हैं। इस कारण शिक्षार्थी न तो अंग्रेजी भाषा जान पा रहा है और न ही मातृभाषा। मातृभाषा और लोक भाषाओं के समृद्ध भण्डार सूखते जा रहे हैं। हम भाषा संस्कार से न सिर्फ विमुख हैं, अपितु उसे भ्रष्ट भी कर रहे हैं। ऊंची-ऊंची नौकरियां पाने की लालसा, अंग्रेजी भाषा में ज्ञान अर्जित कराने की हटधर्मिता, बालकों के कान एेंठकर माता-पिता एवं अध्ययन संस्थाओं द्वारा बच्चों पर दबाव डाला जाता है। स्कूल में मातृभाषा न बोलने और अंग्रेजी में ही संवाद और अध्ययन के लिए प्रताड़ित भी किया जाता है। फलतः बालक स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ता है, परन्तु परिवार और समाज में अपनी-अपनी मातृभाषा में संवाद करता है। उसका आधे से अधिक जीवन मानसिक रूप से अनुवाद करने, दोहरा जीवन जीने और मातृभाषा से कटकर एक कृत्रिम वातावरण में गुजर जाता है। यह विरोधाभाष बालक के व्यक्तित्व विकास और राष्ट्र के उत्थान में बाधक बन रहा है। इस प्रकार भाषाई साम्राज्यवाद और भाषाई उपनिवेशवाद आज न सिर्फ फलफूल रहा है, अपितु इसे बनाए रखने और इसके सतत प्रसार को सुनिश्चित करने के लिये यह मिथ्या प्रसार भी किया जा रहा है कि रोजगार और प्रतिष्ठा की भाषा अंग्रेजी ही है। इस भ्रम के परिणाम स्वरूप भारत में एक भाषाई अभिजात्य वर्ग पैदा हुआ है जो अंग्रेजी के माध्यम से अपने हितों का साधन करता है और शेष भाषाई समाज का शोषण करता है।

शिक्षा-संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव श्री अतुल कोठारी के अनुसार, यह तर्क आधारहीन है कि अंग्रेजी के बिना व्यक्ति और देश का विकास संभव नहीं है। विश्व के आर्थिक एवं बौद्धिक दृष्टि से सम्पन्न देशों-अमेरिका, रूस, चीन, जापान, कोरिया, इंगलैण्ड, फ्रांस, जमर्नी, स्पेन, इजरायल में गणित एवं विज्ञान की पढ़ाई, शिक्षा एवं शासन-प्रशासन की भाषा उनकी मातृभाषा ही है। इजरायल के 16 विद्वानों ने नोबल पुरस्कार मातृभाषा हिब्रू भाषा में ही कार्य के आधार पर प्राप्त किया है। यह भी प्रमाणिक तथ्य है कि विश्व में सकल घरेलू उत्पादन में प्रथम पंक्ति के 20 देशों का समग्र कार्य उनकी अपनी अपनी मातृभाषा में ही होता है तथा साथ ही सकल घरेलू उत्पाद में सबसे पिछड़े 20 देशों में अध्ययन-अध्यापन एवं शोध कार्य आयातित  विदेशी भाषा में होता है।

आज हमें इस अभिप्रमाणित तर्क और सत्य को स्वीकार करना चाहिए कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति और विकास का स्रोत मात्र पूंजी और तकनीकी नहीं, अपितु उस राष्ट्र की संकल्प शक्ति होती है और संकल्प शक्ति मातृभाषा से आती है किसी आयातीत भाषा के ज्ञान से नहीं। विश्व के अनेक राष्ट्रों के विकास और उनकी संकल्प शक्ति का विश्लेषण करें, मूल्यांकन करें तो यही तथ्य उभरकर सामने आता हैं कि मातृभाषा की अद्भुत शक्ति और क्षमता का कोई विकल्प नहीं। ऐसे कई उदाहरण है जिनमें मातृभाषा के प्रति अनुराग और समृद्धि ने राष्ट्र के सम्मान को अभिवृद्ध किया है। दस लाख से लेकर बीस-बीस लाख की आबादी वाले देशों ने मातृभाषा में ही ज्ञान-विज्ञान -तकनीकी, शोध एवं अध्ययन अध्यापन का आधार बनाकर अन्तर्राष्ट्रीय उपलब्धियां प्राप्त की हैं। उदाहरण के लिए डेनमार्क, फिनलैण्ड, स्वीडन, नार्वे इत्यादि अनेक देश हैं जिन्होंने मातृभाषा को ही जीवन का अंग बनाया है और उनकी भाषाओं ने विश्व में सम्मान के साथ संयुक्त राष्ट्रसंघ में भी एक सम्मानित स्वतंत्र देश का प्रतिनिधित्व करने का ओहदा प्राप्त हुआ है। हमने हमारी मातृभाषा को अपने जीवन में अपनाया है। मातृभाषा को विज्ञान और तकनीकी की भाषा बनाया है। मातृभाषा को ही विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों और अकादमिक शोध संस्थानों की भाषा बनाया है। मातृभाषा ही शोध और अभिव्यक्ति की भाषा है। यदि चीन अन्य किसी आयातित भाषा अर्थात् अंग्रेजी भाषा में ही खोया रहता तो आज विश्व की आर्थिक शक्ति एवं वैश्विक प्रतिस्पर्धी राष्ट्र के रूप में स्थापित नहीं हो पाता। इसी प्रकार जापान का भी उदाहरण लिया जा सकता है। द्वितीय विश्वयुद्ध में नागासाकी और हिरोशिमा की घटना के बाद जापान पूरी तरह ध्वस्त हो चुका था, टूट चुका था। उसके बाद जापान की तरक्की का आधार उसकी मातृभाषा और जापानियों द्वारा मातृभाषा को दिया गया सम्मान है। प्राथमिक स्तर से विश्वविद्यालय, अभियांत्रिकी, चिकित्सकीय और सभी अनुसंधान एवं शोध संस्थानों में होने वाला अध्ययन-अध्यापन-अनुसंधान जापानी मातृभाषा में होना ही जापान की तरक्की और विकास का मूलमंत्र है।

भारत के संदर्भ में जब दृष्टिपात करते हैं, विचार करते हैं, विश्लेषण करते हैं तब हमें अत्यधिक दुःख, अपार वेदना और निराशा का सामना करना पड़ता है। क्योंकि विश्व सर्वाधिक आबादी वाले देश चीन से लेकर, अपेक्षाकृत अत्यन्त कम आबादी वाले देशों ने भी मातृभाषा के साथ-साथ राष्ट्रभाषा को न सिर्फ सुरक्षित, संरक्षित और सम्मानजनक  अन्तराष्ट्रीय स्थिति तक पहुॅंचाया है अपितु वहॉं के नागरिकों में भी आत्म सम्मान की वृद्धि हुई है। इन राष्ट्रों के निवासी भाषा, विकास और विश्वास को लेकर किसी असमंजस्य में नहीं हैं। परन्तु 125 करोड़ से अधिक आबादी वाला देश भारत, प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों से सम्पन्न देश भारत, सम्पूर्ण विश्व को डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, समाज वैज्ञानिक, दार्शनिक, चिन्तक, कुशल मजदूर देने वाला देश भारत, मातृभाषा अध्ययन-अध्यापन और शोध की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक गरीब और कमजोर है। अपनी आजादी के सात दशकों के पश्चात् भी भारत अपनी मातृभाषा को स्थापित कर पाया है, न ही मातृभाषा को राष्ट्रभाषा बना पाया है। प्रयास हो रहे हैं, प्रतीक्षा है कब मातृभाषा राष्ट्रभाषा बनेगी? परिणामस्वरूप भारत में आयातित भाषाओं (आंग्ल भाषा) में अध्ययन-अध्यापन एवं शोध कार्य ही प्रमाणिकता का स्थान प्राप्त किए हुए है। यद्यपि भारत के संविधान में 22 भाषाओं को स्वीकृत किया गया है, फिर भी कोई भी राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई है। यह तो निर्विवाद प्रमाणित है कि राष्ट्र, राष्ट्रभाषा के बिना पंगु है। वह अपनी क्षमताओं को सम्पूर्ण रूप से विकसित नहीं कर सकता। एक युग था जब संस्कृत भाषा राष्ट्रभाषा रही और वह कालखण्ड जब संस्कृत भाषा राष्ट्रभाषा थी। भारत विश्व में सर्वोच्च स्थान पर रहा। सातवीं-आठवी शताब्दी तक शिक्षा, व्यापार, तकनीकी, विज्ञान, दर्शन तथा ज्ञान की विविध विधाओं में भारत सर्वोच्च था और ‘‘सोने की चिड़िया’’ कहलाता था। यह तभी संभव हुआ जब भारत की एक राष्ट्रभाषा रही। जैसे-जैसे संस्कृत और राष्ट्रभाषा का पराभव हुआ, विदेशियों के आक्रमण भी बढ़ते गये। मुहम्मद बिन-कासिम, महमूद गजनवी, तैमूरलंग, नादिरशाह, बाबर से लेकर ब्रिटिश, -फ्रांस औपनिवेशिक शक्तियों के कालखंड तक भारत पराधीनता की स्थिति में रहा। इस कालखण्ड में भारत में संचालित 7 लाख, 32 हजार गुरूकुल जहॉं संस्कृत भाषा के अध्ययन केन्द्र थे ध्वस्त कर दिये गए।

औपनिवेशिक कालखण्ड में स्वाधीनता संघर्ष के दौरान मातृभाषा के महत्व और उसकी भूमिका सर्वत्र स्थापित रही। स्वतंत्रता सेनानियों ने नाना साहेब पेशवा, रानी लक्ष्मीबाई, महर्षि दयानन्द, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविंद, सुभाषचन्द बोस, चन्द्रशेखर आजाद, सावरकर इत्यादि सभी ने अपने सम्बोधनों में भारत की मातृभाषा के महत्व को, मातृभाषा की शक्ति को और मातृभाषा के प्रति प्रेम और मातृभाषा के माध्यम से ही राष्ट्रीयता के भाव, राष्ट्रवाद के भाव को उद्वेलित किया तथा राष्ट्रीय आंदोलन को उसके परिणाम अर्थात् स्वराज्य तक पहुंचाया। क्रान्तिकारियों के घोषणा पत्रों का विवेचना करने से स्पष्ट होता है कि नाना साहेब पेशवा चाहते थे कि स्वाधीनता के बाद भारत में सारे काम-काज मातृभाषा में हों। शिक्षा और न्याय मातृभाषा में मिलेगा। 

बाल गंगाधर तिलक के घोषणा पत्र में स्पष्ट लिखा है कि राष्ट्रभाषा का स्थान तो सिर्फ हिन्दी को ही मिल सकता है। दयानन्द सरस्वती मानते थे कि हिन्दी भाषा पूरे देश को एकता के सूत्र में बांध सकती है। सावरकर मानते थे कि स्वाधीनता के बाद अंग्रेजी भाषा का स्थान अगर कोई ले सकता है तो वह मातृभाषा हिंदी ही है। महात्मा गांधी तो हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाये जाने के लिए सत्याग्रह तक करने को संकल्पित थे।


परन्तु स्वतंत्रता के बाद ऐसा क्या हुआ कि महात्मा गॉंधी ने यह बोलना आरंभ किया कि भारत में विज्ञान और तकनीकी विकास अंग्रेजी के बिना संभव नहीं। यह भी तर्क दिए जाने लगे कि अंग्रेजी विश्व की भाषा है, वैज्ञानिक भाषा है, प्रतिष्ठा की भाषा है। परिणामतः हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई और आजादी के बाद अंग्रेजी, अंग्रेजीयत स्थापित हो गई। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में अंग्रेजी को 15 वर्षो के लिए संघ सरकार की भाषा के रूप में स्वीकार किया और कहा कि 1965 में संसदीय समिति की अनुशंसा से संसद में विधेयक पारित कर राष्ट्रपति की अनुशंसा द्वारा हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं को स्थापित किया जाएगा। परन्तु अनुच्छेद 348 में स्पष्ट किया गया कि हिंदी भले ही आम बोलचाल की भाषा रहे परन्तु उच्चतम और उच्च न्यायालय में अंग्रेजी ही प्रामाणिक भाषा रहेगी। हिंदी राष्ट्रभाषा बनने के नाम पर विवाद, आन्दोलन और दंगे भड़कने लगे, तब 1967 में एक विधेयक पारित कर अंग्रेजी की स्थिति को बरकरार और 1968 में आंशिक संशोधन कर कहा गया कि भारत में जितने राज्य हैं उनमें से एक भी राज्य अगर अंग्रेजी का समर्थन करेगा तब तक भारत में अंग्रेजी लागू रहेगी।


क्या यह स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी अथवा इसमें कुछ बदलाव भी होगा ? इस दृष्टि से यदि विचार करें तो विश्व की अन्य भाषाओं और राष्ट्रों की तरह भारत भी उन्नयन कर सकता है। यह तब जब भारत में राजभाषा हिंदी सहित अन्य प्रादेशिक भाषाओं में ही प्राथमिक स्तर से लेकर स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध कार्य होना सुनिश्चित हो तभी मातृभाषा संपुष्ट होगी। इतना ही नहीं इन भाषाओं की, इस कार्य की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पाठ्यपुस्तकों/पाठ्यक्रम/पाठ्यसामग्री का लेखन और अनुवाद कार्य भी विभिन्न भाषाओं के मानक स्तर तथा गुणवत्ता पूर्ण होना चाहिए। इस कार्य में तकनीकी शब्दावली आयोग एवं अन्य क्षेत्रीय आयोग भी अपनी रचनात्मक भूमिका निर्वाह कर सकते हैं। तभी मातृभाषा का कुल विकसित एवं सम्पन्न होगा।


भारत के विभिन्न प्रान्तों में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाएं सुद्रण तभी होंगी जब मातृभाषाओं में परस्पर सम्पर्क, सम्प्रेषण, समन्वय, सहयोग तथा विचारों एवं भावनाओं का विनिमय आदान-प्रदान होगा। तभी भाषा राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकेगी। हमें मातृभाषा के प्रचलन को व्यापक रूप में व्यवहार में लाना होगा। भारत में 65 प्रतिशत से अधिक बोली जाने वाली मातृभाषा हिंदी में विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं को एकता के सूत्र में पिरोने की क्षमता है। हिमालय से कन्याकुमारी तथा असम से सौराष्ट्र तक संपूर्ण सांस्कृतिक और आर्थिक विनिमय के साथ साथ प्रशासन, व्यापार, और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्षमता हिंदी भाषा में है। बहुभाषिक संस्कृति को जोड़ने उनको नेतृत्व प्रदान करने तथा भारतीयता की अवधारणा को व्यवहारिकता के धरातल पर अवतरित करने की सामर्थ्य हिंदी भाषा में है। निःसंदेह न सिर्फ भारत और उप-महाद्वीप में अपितु संपूर्ण विश्व में भारत के गौरव एवं ज्ञान संपदा और ज्ञान परम्परा को संप्रेषित करने तथा संवर्धित करने की क्षमता हिंदी भाषा में है। तभी तो विश्व के 170 देशों में किसी न किसी रूप में हिंदी भाषा पढ़ाई जाती है। आज विश्व के 32 से अधिक विश्वविद्यालयों में संस्कृत भाषा का अध्ययन हो रहा है और इंगलैड के सेंट जेम्स विद्यालय में तो 6 वर्ष तक संस्कृत भाषा पढ़ना अनिवार्य है। आओ हम सब क्यों न इस दिशा में सोचें, विचार करें और हो सके तो अनुकरण भी करें।



प्रो. रामदेव भारद्वाज


कुलपतिः अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्याल, भोपाल



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