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इस दिन को स्वर्णिम कहूं या श्याम ?

1/13/2018 12:00:00 AM

सुबह दिन की शुरुआत हुई तो देश के सामने इसरो के झंडे गाड़ने का नजारा था, 100वां सेटेलाइट लांच हो गया था, हर भारतीय को गर्व की अनुभूति हो रही थी। अभी दोपहर भी नहीं हुई थी कि तभी तरह तरह की आवाजें आने लगीं, देश के इतिहास में पहली बार, सुप्रीम कोर्ट के जजों ने CJI पर उठाए सवाल, CJI पर जनता करे फैसला। ये सभी आवाजें नपे तुले शब्दों में, फूंक फूंककर, हमारे सामने तमाशा यंत्र पर रखी जा रही थी, लेकिन आज पहली बार एक भारतीय होने के नाते, मन सवालों से भर गया, जहन में एक ही बात कौंध रही थी कि भरोसा आखिर किया किस पर जाए। फिर बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी का एक बयान आया, जिसमें उन्होंने कहा कि जजों के भीतर बहुत वेदना थी, इसलिए इस मामले का हल निकालने के लिए प्रधानमंधी मोदी को हस्तक्षेप करना चाहिए। अब सवाल ये खड़ा हो गया कि आखिर इस मामले में प्रधानमंत्री मोदी को हस्तक्षेप करना क्यों चाहिए ? क्योंकि अभी तो सुप्रीम कोर्ट के 21 जजों में से 4 ही जजों ने सवाल खड़े किए हैं, बाकी सभी जजों ने कुछ भी नहीं कहा। पूरे दिन की गहमागहमी सिर्फ इस बात पर टिकी थी, कि इस दिन को स्वर्णिम कहें या श्याम ? सही ठहराएं या सवाल उठाएं ?  


वैसे सवाल से याद आया संघ विचारक गोविंदाचार्य ने गुरुवार को कुछ सवाल खड़े किए थे, उन्होंने कहा था कि सरकार जिस राह पर चल रही है, वो रास्ता आगे चलकर ब्राजील की ओर निकलता है। 24 घंटे भी नहीं बीते कि सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों को ये कहना पड़ा कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं है। इनमें प्रमुख आरोप में कहा गया कि ‘चीफ जस्टिस केसों के बंटवारे में नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं, महत्पूर्ण मामलों को चीफ जस्टिस उन बेंचों को सौंप देते हैं, जो चीफ जस्टिस की पसंद की हैं, इससे संस्थान की छवि बिगड़ी है, हम ज़्यादा केसों का हवाला नहीं दे रहे हैं, हमने इसकी शिकायत CJI से की लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा, इसलिए हमें मीडिया के सामने आना पड़ा, ऐसा कर के हमने देश का कर्ज चुकाया है।’ कई और आरोप भी उन्होंने लगाए हैं उन पर भी बात होगी, लेकिन पहले मुझे बताइए कि ये चुप्पी अगर आज ना टूटती तो क्या होता ? क्या होता अगर वो इस बात को यहीं भूल जाते ? क्या होता अगर वो अंदर ही अंदर घुटते रहते और इस बात को किसी से भी नहीं कहते, कि देश की सुप्रीम कोर्ट में सबकुछ ठीक नहीं है। मुझे लगता है कि अगर महात्मा गांधी ने 1915 में अपने भीतर से निकलती आजादी की आवाज को दबा दिया होता तो शायद हम और आप अब भी गुलामी की जंजीरों में जकड़े होते, लेकिन उन्होने ऐसा नहीं किया और आवाज उठाई। किसी भी देश के लोकतंत्र में आवाज उठाना ही तो इसका परिचायक है कि आपके लब आजाद हैं, तो अगर जजों ने लबों की लगाम तोड़ी है तो क्या गलत किया ?  क्यों कि अगर वो चुप रहते तो अंदर ही अंदर उनकी ये चुप्पी घुन की तरह देश को खा जाती, क्यों कि न्यायपालिका को हम सभी देश के भगवान का दर्जा देते हैं, तो क्या भगवान की बात नहीं सुनी जानी चाहिए ? वो भी उन मसलों पर जो सीधे आपसे जुड़े हैं।



यहां कई बार जस्टिस बीएच लोया की मौत का जिक्र भी हुआ, जस्टिस लोया की मौत 1 दिसंबर 2014 को नागपुर में हुई थी, जस्टिस लोया CBI की स्पेशल कोर्ट में सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले को देख रहे थे। इसी केस में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत गुजरात के कई बड़े अफसर नामजद आरोपी हैं, सुनी सुनाई बातें कहती हैं कि जज लोया की मौत 1 दिसंबर 2014 को नागपुर में हुई थी, जिसकी वजह दिल का दौरा पड़ना था। वो नागपुर अपनी सहयोगी जज स्वप्ना जोशी की बेटी की शादी में गए थे, लेकिन जस्टिस बृजगोपाल लोया के परिजन से हुई बातचीत का हवाला देते हुए नवंबर 2017 में ‘द कारवां पत्रिका’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट कहती है कि, जस्टिस लोया की मौत संदेहास्पद थी और इस पर सवाल भी खड़े करती है, इस पत्रिका की रिपोर्ट के बाद पूर्व न्यायाधीशों ने इस मामले की जांच की मांग की। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में महाराष्ट्र सरकार से पोस्टमार्टम रिपोर्ट मांगी, जिस पर सुनवाई सोमवार को होनी है। 



9 जनवरी को बहरीन यात्रा के दौरान राहुल गांधी भी इस बात को कह चुके हैं कि भारत में संवेदनशील मामलों की जांच कर रहे जजों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो रही है। आज भी कांग्रेस का रुख यही था, कि इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जजों से करवाई जाए, अब एक और तस्वीर मैं आपको दिखाता हूं, इन चार जजों ने चीफ जस्टिस को लिखी अपनी चिट्टी में कहा कि ‘मेमोरेंडम ऑफ प्रॉसिजर का ना ठीक तरह से पालन हो रहा है और ना ही इसे परिभाषित किया जा रहा है।’ यहां एक जज का जिक्र करना जरूरी हो चला है, 2011 में गुजरात हाईकोर्ट का जज रहने के दौरान जज जयंत एम पटेल ने ही इशरत जहां केस में CBI जांच का आदेश दिया था, जस्टिस पटेल उसी बेंच का हिस्सा था, अब देखिए आगे क्या हुआ.. क्यों कि इसके बाद जस्टिस जयंत पटेल कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचते हैं, जहां सीनियरटी के आधार पर वो अगले हाईकोर्ट चीफ जस्टिस बनने वाले थे, क्योंकि 9 अक्टूबर को वहां के चीफ जस्टिस एसएन मुखर्जी रिटायर होने वाले हैं, लेकिन उसके पहले ही जस्टिस जयंत पटेल का तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट में कर दिया गया, जिसके बाद जस्टिस जयंत पटेल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, क्योंकि अगर वो इलाहाबाद हाईकोर्ट में जॉइन करते तो संभवत: जूनियर जज ही रह जाते, जस्टिस जयंत पटेल के तबादले के विरोध में गुजरात और कर्नाटक की बार काउंसिल ने हड़ताल तक की थी, अब जरा फिर लौटिए सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के मसले पर, तो इन्होंने पत्र में लिखा कि ‘हमारे पास कोई चारा नहीं बचा था, इसके बावजूद हम इस पत्र में ज्यादा मामले मेंशन नहीं कर रहे हैं ताकि इससे किसी को शर्मिंदगी ना हो।’


वैसे जस्टिस लोया की मौत पर जमी धूल की परतों को The Caravan के संवाददाता निरंजन टाकले ने ही हटाया था, हालांकि तब इस रिपोर्ट पर देश की मीडिया का ध्यान नहीं गया था, कुछ गिने चुने और जाने पहचाने मीडिया संस्थानों को छोड़ दिया जाए तो शायद किसी ने इसे दिखाने की जहमत नहीं उठाई, अब देखिए चौथी तस्वीर लखनऊ के प्रसाद मेडिकल कॉलेज को सरकार से मंजूरी नहीं मिली तो इजाजत के लिए उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, स्टे तो मिला लेकिन आरोपों के कटघरे में कोर्ट से जुड़े लोग भी खड़े थे, क्योंकि इन आरोपों में कहा कि मेडिकल कॉलेज की इजाजत के लिए न्यायपालिका से जुड़े लोगों को घूस दी गई। सीबीआई ने FIR दर्ज करने के बाद छापा मारा तो 2 करोड़ बरामद भी हो गए और इसके बाद उड़ीसा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस आईएम कुद्दुसी के घर छापा मारा गया, ये भी पहली बार ही हुआ था न्यायपालिका से जुड़े लोग आरोपों के कटघरे में थे, तो एक याचिका पर एडवोकेट प्रशांत भूषण इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए और कहा कि इस मामले की जांच CBI से नहीं बल्कि SIT से करवाई जाए, इस मामले की सुनवाई जस्टिस चेलमेश्वर को करनी थी, लेकिन इसलिए जस्टिस चेलमेश्वर ने इसे पांच जजों की संविधान पीठ को भेजने का फैसला किया, याचिकर्ता चाहता था कि जस्टिस दीपक मिश्रा MCI के मामलों से जुड़े रहे हैं, इसलिए उनको संविधान पीठ से अलग रखा जाए। जस्टिस चेलमेश्वर ने जस्टिस दीपक मिश्रा को इससे दूर भी रखा, लेकिन तभी चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने पांच जजों की पीठ का गठन कर दिया और कहा कि वो ये देखे कि ‘क्या जस्टिस चेलमेश्वर इस तरह का आदेश दे सकते हैं।’ इसके बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा द्वारा बनाई गई संविधान पीठ ने ये कहते हुए जस्टिस चेलमेश्वर का ऑर्डर रद्द कर दिया कि ‘चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ही मास्टर ऑफ रोस्टर हैं', जो बेंच का गठन कर सकते हैं’ फिर 5 सदस्यीय जिस बेंच का गठन हुआ उसने इस याचिका को खारिज कर दिया।

 


मैं ज्यादा कुछ तो इस मामले में बोल नहीं सकता, लेकिन अंदर से लगता है कि देश के सभी जज सोचते होंगे, क्या मैं किसी की उम्मीद बन सकता हूं। क्यों कि जब भी आप थक हार कर कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं तो न्यापालिका ही आपको ये महसूस करवाती है आपका वजूद इस देश में है, आपका अधिकार और आपको न्याय हम देंगे, लेकिन लगता है, राजनीति के कुछ जहरखुरान कुछ और ही तस्वीर गढ़ रहे हैं। 


ब्लॉगर: अनुराग सिंह


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