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हम "चम्मच चोर" नहीं हैं..

1/13/2018 12:00:00 AM

पाकिस्तान के कासुर में 8 साल की ‘जेनब’ का अपहरण करने के बाद बलात्कार किया गया और फिर बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया, इस घटना ने पाकिस्तान को इतना शर्मिंदा कर दिया कि सोशल साइट्स से लेकर सड़कों तक एक ही आवाज सुनाई देने लगी, ‘जस्टिस फॉर जेनब’ क्योंकि कातिल अब भी सलाखों से दूर है, लेकिन इस घटना को लोगों से जोड़ने का जो तरीका वहां की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने चुना वो बेहद अहम है, क्योंकि वहां के समा न्यूज चैनल की एंकर ने अपनी छोटी सी बेटी को अपने साथ बैठाकर बलात्कार और मौत का शिकार हुई उस मासूम बच्ची का बुलेटिन पढ़ा, क्योंकि ये एंकर एक मां का दर्द बयां करना चाहती थीं, वीडियो काफी वायरल भी हो रहा है और वैश्विक मीडिया में इसकी सराहना की जा रही है, इस पूरी घटना में वहां की मीडिया ने खबरों का बिल्कुल सही इस्तेमाल किया, वहां की जनता को जागरूक करने के लिए।


अब जरा याद कीजिए 16 दिसंबर 2012 को हुए निर्भया कांड की घटना के बारे में, यही सर्दी थी, जब शर्मसार हुआ था भारत, दिल्ली की सड़कों पर नारे लग रहे थे "निर्भया हम शर्मिंदा हैं, तुम्हारे कातिल जिंदा हैं", क्योंकि इस दिलदहला देने वाली घटना ने देश ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था, हर शख्स खुद से पूछ रहा था कि आखिर कमी रह कहां गई और हर किसी की जुबान पर जन सरोकार वाली पत्रकारिता की तारीफ थी, क्योंकि उन दिनों देश की मीडिया ने पूरे देश को एक सूत्र में बांध दिया था, बल्कि ऐसी कई घटनाएं भी सामने आईं थीं जब निर्भयां कांड का जिक्र होते ही एंकर्स की आंखों से आंसू छलक उठे थे, लेकिन ये दौर देश ने पहली बार नहीं देखा और ना ही पाकिस्तान की मीडिया ने, याद कीजिए पाकिस्तान के स्कूल में हुई आतंकवादी घटना को और याद कीजिए दिल्ली में 29 अप्रैल 1999 को हुए जेसिका लाल मर्डर को और याद कीजिए जब 2006 में दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी मनु शर्मा को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, क्यों कि इन घटनाओं में अगर मीडिया ट्रायल ना हुआ होता तो शायद तस्वीर ही कुछ और होती। यानि हर मीडिया पर्सन ने अपनी जिम्मेदारी को बड़ी संजीदगी से निभाया, लेकिन ये कहने का मतलब ये बिल्कुल नहीं था कि हर दिन एक मीडिया पर्सन अपने काम को संजीदगी से नहीं निभाता है, बेशक करता है लेकिन जब चम्मच चोर कहा जाने लगे, तो कुछ याद दिलाना जरूरी होता है। 


फिनलैंड, नीदरलैंड, नॉर्वे, डेनमार्क, न्यूजीलैंड, कोस्टारिका, स्वीडेन, आयरलैंड, जमैका, ऑस्ट्रेलिया, ये वो देश हैं जहां की मीडिया ने बाजारवाद से जंग की और आज सफल भी हैं और खुश भी, ये और बात है कि भारत बाजारवाद से नहीं जीत पाया, लेकिन यहां भी जान हथेली पर रखकर काम किया गया है, फिर चाहे वो दौर आजादी के समय का रहा हो या उसके बाद का, लोग तो हैं जो अपना काम ईमानदारी से अदा कर रहे हैं, नहीं तो घोटालों की फेहरिस्त, अपराधियों का काला चिट्ठा, खोज करना, खेलों का वैश्वीकरण, महिला सशक्तिकरण, आर्थिक घटतौली, ग्रामीण मर्म, विकास का बायपास, रेडियो का रास्ता, दूरदर्शन का दैविक चमत्कार और सत्ता को आइना किसने दिखाया होता, रही बात एक पत्रकार के जीवन में पैसे की, तो मुझे लगता है कि हमें इस बात पर मंथन करना चाहिए कि एक पत्रकार को चम्मच चोर बनाया किसने ?

ब्लॉगर: अनुराग सिंह


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