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वो दुनिया, जो यूं बसाई थी कभी...!

19 Aug 2017

वे लंबी, गर्मी से भरी दोपहरें थीं। जब न घर पर टीवी था और न ही वीडियो गेम नाम का कोई मनोरंजक खिलौना। हां उन लंबी, उमस और टेबल फेन की घर्र..घर्र आवाजों के बीच कटती उन दोपहरों में एक दुनिया थी, जो कॉमिक्‍स के चंद पन्‍नों में बचपन रचती थी। इसी दुनिया में यही सब मेरे दोस्‍त थे (जिनकी तस्‍वीरें गूगल के किसी कोने में आज भी हरी-भरी हैं।) इसी दुनिया में मेरी एक नदी बहती थी और पहाड़ों के पीछे से निकलता सूरज भी वहीं मुस्‍कुराता था, जबकि चांद टेढ़ी नजर से वहीं देखता था। पिकनिक, सैर सपाटा, बेवजह घूमना और जंगलों की सैर, सब इसी दुनिया के इन्‍हीं दोस्‍तों के साथ हुआ करती थी। यकीन मानिए, मेरा पूरा अतीत इसी दुनिया के इन्‍हीं पात्रों के बीच रचा-पगा है।


साबू के लिए बिन्‍नी चाची जो आलू के पराठे बनाती थी, जाने क्‍यों तब मुझे भी भूख लग आती थी? मैं चाचा चौधरी के ट्रक डगडग में एक बार घूमना चाहता था। ऐसा लगता था कि मेरे घर के दरवाजे पर भी कोई रॉकेट होना चाहिए और एक साबू भी, जिसके कंधे पर मैं चाचा जैसे बैठकर घूम सकूं और घूमते हुए मुझे भी राका और धमाका सिंह मिल जाएं।



साबू का घर ज्‍यूपीटर आज भी मेरी कल्‍पनाओं के कोने में जिज्ञासा का गुदगुदाता टुकड़ा है। पिंकी जैसा नटखट होने की अक्‍सर कोशिश में रहा। उसकी प्‍यारी सी लगने वाली गिलहरी कुटकुट और उसकी कॉलोनी में घूमने की बहुत इच्‍छा रही। छत पर आज भी गिलहरियां देखता हूं, तो मुझे कुटकुट ही याद आती है। फिर पिंकी के दोस्‍त, भीखू और चंपू तो आज भी मेरे लिए दोस्‍तों की सबसे सुंदर परिभाषा है। पड़ोसी तो फिर झपट जी जैसा कौन नहीं चाहेगा।



हां, इधर बिल्‍लू के साथ क्रिकेट खेलने की बहुत इच्‍छा होती थी, लेकिन कभी खेल नहीं पाया। वैसे उसके जैसे बाल बनाने की मैंने कई बार कोशिश की, लेकिन मेरी आंखे दिखाई दे जाती थी और अक्‍सर कई बार तो मैं कॉमिक्‍स में एक ऐसा चित्र भी ढूंढने की कोशिश करता, जिसमें बिल्‍लू की आंखें दिख जाए, लेकिन मैं आज तक उसकी आंखे नहीं देख पाया। बिल्‍लू का छोटा सा कुत्‍ता, मोती आज भी याद आता है। दोस्‍त जोजू, मोनू और बिशेम्‍बर, दुश्‍मन बजरंगी और उसका चेला ढक्‍कन इनकी सारी दुनिया ही मेरी दुनिया हो गई। 



रमन, चन्‍नी चाची, श्रीमती जी जैसे लोग जीवन में लंबे समय तक ढूंढता रहा, लेकिन नहीं मिले। हां, बांकेलाल खूब मिले, लेकिन उन्‍हें शंकर जी का वैसा श्राप नहीं था, जिसके चलते किसी का (महाराजा विक्रम सिंह का) बुरा करने पर भला हो जाता था। आज तो...!



बहरहाल, स्‍मृतियों में इस दुनिया का अतीत जाने क्‍यों मुझे आज भी हरा-भरा लगता है, इस बात को जानते हुए भी की, पंगडंडियां बहुत पीछे छूट चुकी हैं, और दोपहरें एसी की कृत्रिम ठंडक में डूबकर बर्फ सी ठोस हो गई हैं। यहां हर चीज सपाट और सूखी है। यह दुनिया भी, जो आभासीय हो चुकी है, भीतर भी और बाहर भी...!



(फोटो गूगल से ली गई हैं)

ब्लॉगर सारंग उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली


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