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क्या है साइकोपैथ ? भोपाल की इस घटना ने बदल दी मनोविज्ञानिकों की थ्योरी

06 Feb 2017

बदलते हुए सामाजिक परिवेश में मनोरोग घातक रूप धारण करता जा रहा है। जिसे असामाजिक व्यक्तित्व विकार भी कहते हैं। हालांकि इसे अबतक ठीक ढंग से परिभाषित नहीं किया जा सका है। ऐसे में साइकोपैथ को समझने में उलझन जरूर होगी। ‘छल’ और ‘हेरफेर’ साइकोपैथ के दो चेहरे माने गए हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानाना है कि साइकोपैथ हिंसक नहीं होते, लेकिन भोपाल की इस घटना ने उनके इस विचार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 



एक सामान्य शख्स के सामने ये सवाल जरूर खड़ा होगा कि साइकोपैथ के लक्षणों को किस तरह समझा जाए। मसलन यदि कोई नियमित रूप से कानून का अनादर करता हो। लगातार झूठ बोलकर दूसरों को धोखा देता हो। आवेग में निष्कर्ष की चिन्ता नहीं करता हो। हरदम लड़ाई के लिए आक्रामक रहता हो। दूसरों की सुरक्षा का उसे कोई ध्यान नहीं होता। वो गैर जिम्मेदाराना रवैया अख्तियार किए होता है। साथ ही वित्तीय दायित्वों को पूरा ना करता हो, उसे पश्चाताप या अपराध का एहसास नहीं होता। ये सभी ऐसे बिन्दु जो साइकोपैथ से जुड़े हो सकते हैं। 



साइकोपैथ अक्सर कृत्रिम और उथले रिशतें बनाते हैं। वो लोगों को ‘प्यादा’ समझकर अपना मनोरोगी लक्ष्य पूरा करते हैं। उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि उनके व्यवहार से दूसरों को कितनी पीड़ा हो सकती है। भोपाल के साकेत नगर में रहने वाले 32 साल के साइकोपैथ सीरियल किलर ने कुछ इसी तरह अपने परिवार को खत्म कर दिया। उदयन की लिव इन रिलेशन पार्टनर आकांक्षा की लाश चबूतरे से बरामद हुई, तो उसके मां-बाप के कंकाल रायपुर स्थित घर से मिले। जिनकी सात साल पहले हत्या करके उदयन ने लाश घर के बागीचे में दफना दी थी, लेकिन इतना सबकुछ होने के बाद भी उदयन को ना दुख है और न ही किसी तरह का पश्चाताप। 



उदयन ऐसी लाइफस्टाइल जी रहा था। जिसे देखकर यकीनी तौर पर कोई भी धोखा खा जाता। फेसबुक पर प्रेमिका आकांक्षा की आईडी भी वही चलाता था। पड़ोसियों के मुताबिक उदयन की जिस तरह से परवरिश हुई, वो उसके इस बर्ताव के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। 



मनोविज्ञान से जुड़े शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि सोशियोपैथी पर्यावरणीय कारकों का परिणाम होता है। जैसे एक बच्चे या किशोरी की परवरिश ‘नकारात्मक’ परिवार हुई हो तो बचपन मानसिक उल्झनों से गुज़रता है। हो सकता है उदयन को रिश्तों और भावनात्मक प्रेम का एहसास नहीं मिला हो, जिसके कारण उसपर हैवानियत सवार हो गई। हालांकि जुर्म तो जुर्म ही होता है, भले ही उसका रूप कैसा भी क्यों ना हो।


ब्लॉगर-अनुज अरेले

 पत्रकार


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