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चार साहिबजादों की शहादत को प्रणाम, यूं इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गई ये तारीख

12/25/2016 12:00:00 AM

दिसंबर के आखिरी दिनों में गुरु गोबिन्द सिंघ जी महाराज के चार साहिबजादे (सुपुत्र) धर्मों की आजादी के लिए शहीद हुए थे। जिनकी याद में दुनियाभर में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। अमृतसर से लेकर राजधानी भोपाल तक कई कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। अमृतसर में रविवार को नौजवानों की संस्था अकाल पुरख की फौज ने बच्चों को धार्मिक भावनाओं से जोड़ा। "साड्डा विरसा साडा मान" कार्यक्रम के दौरान नन्हें हिर्देश्वर सिंघ ने तबले की विभिन्न ताल पेशकर मौजूद लोगों का दिल छू लिया। 



इस मौके पर अकाल पुरख की फौज के अध्यक्ष जसविन्दर सिंघ ने कहा कि सिख पंथ में संगीत का काफी महत्तव है। संपूर्ण गुरुवाणी सिद्धांत रूप में है। जिसे रागों में गाया जाता है। इसके लिए पारंपरिक साजों की जानकारी होनी बेहद जरूरी है। जसविन्दर सिंघ ने कहा कि सिख बच्चों को चार साहिबजादों की तरह होना चाहिए। आत्मविश्वासी, संकल्पित और उर्जावान बच्चे धर्मों की रीढ़ होते हैं। उनमें धर्म के प्रति जागरुकता होनी चाहिए, ताकी वो आदर्श जीवन जी सकें।   



चार साहिबजादों की याद में भोपाल के टीटी नगर स्थित गुरुद्वारा श्री गुरु सिंघ सभा में पेंटिंग, लेक्चर, कविता और कीर्तन प्रतियोगिताएं रखीं गई। जिसमें लगभग 80 बच्चों ने भाग लिया। गुरमत स्टडी सर्कल की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कविता मुकाबले के दौरान रौनक कौर ने पहला, जसजोत सिंघ ने दूसरा स्थान प्राप्त किया। इसी तरह कीर्तन प्रतियोगिता में पहला स्थान कृतिका कौर ने हासिल किया। लेक्चर में जोरावर सिंघ ने अपना जौहर दिखाया। पेंटिंग प्रतियोगिता के सीनियर ग्रुप में संदीप सिंघ और करन सिंघ ने बाजी मारी। संस्था के मुख्य बरजिन्दर सिंघ ने बताया कि प्रतियोगिताएं धार्मिक शिक्षा के प्रचार का उत्तम तरीका है। इससे बच्चों को धर्म की जानकारी आसानी से हासिल होती है।



खालसा यूथ विंग के सदस्य गुरु पिता, गुरु गोबिन्द सिंघ जी महाराज के प्रकाश पर्व की तैयारियां कर रहे हैं। यूथ विंग के सदस्य परमवीर सिंघ वजीर के मुताबिक भोपाल में 2 जनवरी को प्रकाश पर्व के मौके पर नगर कीर्तन का आयोजन किया जा रहा है। जिसके लिए लोगों को घर-घर जाकर जोड़ा जा रहा है। अबतक 500 से ज्यादा घरों में जाकर लोगों के संपर्क किया गया है।  



आनंदपुर छोड़ते समय सरसा नदी पार करते हुए गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार बिछुड़ गया था। गुरु माता, माता गुजरी जी और दो छोटे सा‍हिबजादे जोरावर सिंघ और फतेह सिंघ सहित गुरु गोबिंद सिंघ जी और उनके दो बड़े पुत्र अजीत सिंघ जी, जुझार सिंघ जी अलग-अलग हो गए थे। सरसा नदी पार करते ही दुश्मन सेना ने हमला बोल दिया था।  


चमकौर के भयानक युद्ध में गुरुजी के दो बड़े साहिबजादे सवा लाख मुगल फौज को धूल चटाते हुए शहीद हो गए। जिनमें बड़े साहिबजादे अजीत सिंघ की उम्र महज 17 वर्ष, साहिबजादा जुझार सिंह की उम्र 15 वर्ष थी। गुरुजी ने अपने हाथों से उन्हें शस्त्र सजाकर मैदाने जंग में भेजा था। इस भयानक युद्ध में दोनो बड़े साहिबजादे शहीद हो गए। 



उधर माता गुजरीजी, छोटे साहिबजादे जोरावर सिंघ जी उम्र 7 वर्ष, और साहिबजादा फतेह सिंह जी उम्र 5 वर्ष को गिरफ्तार कर सरहंद के नवाब वजीर खां के सामने पेश किया गया। जहां उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए कहा गया, लेकिन साहिबजादों ने कहा कि हर मनुष्य को अपना धर्म मानने की पूरी आजादी हो। जिससे नाराज वजीर खां ने उन्हें दीवारों में चुनवा दिया। मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए दोनो गुरु पुत्रों ने बलिदान दिया।




साहिबजादों की शहादत के बाद गुरु माता ने वाहेगुरु का शुक्रिया अदा कर अपने प्राण त्याग दिए। तारीख 26 दिसंबर गुरु गोबिन्द सिंघ जी के संपूर्ण परिवार के बलिदान के कारण सुनहरी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। गुरु जी ने कहा था कि चार पुत्र और परिवार नहीं रहा तो क्या हुआ? मुझे खुशी है, ये हजारों सिख जीवित हैं, जो मेरे लिए मेरे पुत्रों से बढ़कर हैं।


(सभी तस्वीरें गूगल से धन्यवाद सहित)

  

ब्लॉगर : तजिन्दर सिंघ, भोपाल


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