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आओ रेप पर बात करें...एक मां का अपने बेटे को खत

16 Dec 2016

आओ रेप पर बात करें....ये पढ़कर भले कुछ अजीब लगे, लेकिन दिल्ली की एक मां ने अपने 15 साल के बेटे को खत लिखा। जिसमें उन्होंने बेटे को चिट्ठी लिखकर महिलाओं के शोषण के अपने अनुभव बताए। मां ने बेटे से को बताया कि उसे जिंदगी में लड़कियों के बारे में कैसे सोचना चाहिए। मां ने बेटे को जो खत लिखा उसकी चंद लाइने इस प्रकार हैं।


खत में मां ने बेटे को समझाते हुए लिखा ''मैं तुम्हे लिख रही हूं ना सिर्फ एक मां की तरह नहीं, बल्कि एक औरत होने के नाते भी। मैं तुम्हें लिख रही हूं क्योंकि पीछा करना, छींटाकशी, यौन शोषण और बलात्कार जैसे शब्द तुमने खबरों में सुने होंगे, शायद स्कूल में इन पर डिबेट हुई होगी। ये शब्द सिर्फ इतने तक ही नहीं हैं, ये वो सच्चाई है, जिसका हर औरत सामना करती है। हालांकि इसके रूप अलग-अलग हो सकते हैं। मैं जानती हूं कि ये बात तुम्हें परेशान करेगी, लेकिन मैं तुम्हें बता देना चाहती हूं कि तुम्हारी मां भी शोषण का शिकार हुई है। तुम्हारी बहन भी और तुम्हारी दादी भी नहीं बचीं थी।" 



मन की बात बयां कपते हुए मां ने लिखा "जब तुम छोटे थे तो टीवी पर रेप की खबरें आने पर मैं चैनल बदल दिया करती थी, ताकि तुम्हारी मासूमियत को बचा सकूं। 2012 में दिल्ली गैंगरेप के बाद इस मुद्दों को लेकर काफी बहस हुईं। तुम नहीं जानते कि ये मुद्दे कैसे होते हैं। शोषण का कोई एक तरीका नहीं, कई तरह के शोषण का सामना औरतों को करना पड़ता है। मुझे इस बारे में आपसे क्यों बात करनी है? मुझे लड़कियों से बात करनी चाहिए और उन्हें हिफाजत से रहने के लिए कहना चाहिए। आखिर ये लड़कियों का विषय है और तुम लड़के हो। क्या मैंने ठीक कहा?'' ''बेटा, सच्चाई ये है कि अगर हर लड़का एक ऐसी तहजीब के साथ बड़ा हो, जहां लड़कियों की इज्जत करना सिखाया जाए तो ये सारे मामले आज हमारे सामने ही ना होते।" 



"लड़के तो लड़के होते हैं, ऐसा तुमने लाखों बार सुना होगा। इस पर विश्वास नहीं करना। जब तुम्हारा कोई दोस्त किसी लड़की पर तंज कसे तो हंसना मत, अपने दोस्त का विरोध करना। हिंसा या शोषण तभी बढ़ता है, जब उसे कुछ लोग समर्थन करते हैं और ऐसा करने वालों से जवाब नहीं मांगा जाता। तुमको कभी सोचना चाहिए कि आखिर क्यों सारी गालियां औरतों को ही दी जाती हैं। फिल्म के दौरान भी बलात्कार पर लोग हंसते हैं, जैसे ये मनोरंजन है। लड़की के मना करने को हां समझते हैं। आखिर उसकी ना को ना को ना क्यों ना माना जाए?" 



उस मां ने खत में लिखा कि "मैं तुम्हारे ऊपर अपनी सोच को थोपना नहीं चाहती, मैं चाहती हूं कि तुम इस पर खुद सोचो कि क्या सही है। तुमको अपने दोस्तों से लड़के-लड़कियां सभी से बात करनी चाहिए। तुमको ये नहीं कहना है कि मैं अकेला क्या कर सकता हूं क्योंकि तुम अकेले नहीं हो। लोग बदलाव चाहते हैं, लेकिन आगाज के लिए किसी का इंतजार करते हैं। हमेशा याद रखना अगर तुम किसी समस्या के समाधान में शामिल नहीं हो तो फिर समस्या में शामिल हो।"


एक मां ने अपने बेटे को ये बताने के लिए लिखा कि महिलाओं के प्रति सोच बदलने की जरूरत है। उन्हें आदर और सम्मान दोना होगा। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को बराबरी देने के कितने की दावे क्यों ना किए जाते हों, लेकिन सच्चाई आज भी बिल्कुल अलग है। स्त्री को उसे सहानुभूति नहीं, सम्मान की जरूरत है। यही उसकी ताकत है।  


अनुराग सिंह


टीवी पत्रकार


(सभी तस्वीरें गूगल से धन्यवाद सहित)


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