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क्या देश में उद्योगों के लिहाज़ से उतना बेहतर माहौल नहीं बन पाया। जिसकी उम्मीद जगाई गई थी ? क्या केंद्र के वायदों से उलट जमीनी हकीकत कुछ और ही है, जहां उद्योगपतियों को निवेश के लिए माहौल नहीं मिल पा रहा है ? ये सवाल इसलिए क्योंकि देश के जाने-माने उद्योगपति रतन टाटा ने इस दिशा में अपनी चिंता जताई है। टाटा ने केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि सिर्फ पीएम मोदी के वायदों से ही निवेश नहीं आने वाला। वादों पर भरोसा कर जब कंपनियां आती हैं, तो उन्हें निवेश के लिए अनुकूल माहौल भी मिलना चाहिए। बकौल टाटा भारतीय उद्योगपतियों में इस बात को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है कि केंद्र सरकार जमीनी स्तर पर ठोस काम नहीं कर रही है। इसका नतीजा ये सामने आ रहा है कि निवेश में उम्मीद से ज्यादा देरी हो रही है। विदेशी निवेशक अब भी भारत में पैसा लगाने से हिचकिचा रहे हैं। 


रतन टाटा की चिंता को इसलिए नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि मोदी सरकार से उद्योग जगत को अब भी बड़ी आस है, लेकिन 20 महीने बाद भी अगर सरकार नतीजों की शुरुआत नहीं कर पाएगी, तो सवाल तो उठेंगे ही। राजनीतिक मोर्चे पर भी मोदी सरकार पर निशाने साधे जा रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी तो दावा कर रहे हैं कि देश में किसान, मजदूर और व्‍यापारियों के साथ-साथ बड़े-बड़े उद्योगपति भी रो रहे हैं। 


हालांकि अगर बात करें आर्थिक मंदी और सरकारी दावे की तो भले ही दुनिया भर की आर्थिक स्थिति संकट में है, लेकिन भारत स्थिरता के साथ खड़ा है। हालांकि नई सरकार आने के बाद से अब तक स्टॉक मार्केट में गिरावट आई है, रुपए का अवमूल्यन हुआ है। यही वजह है कि सरकार के आशावादी रुझान और बाज़ार के रुझान में तालमेल नहीं दिख रहा है। क्या सरकार बजट में कुछ अहम ऐलान कर निवेश का बेहतर माहौल पैदा करेंगे।

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